कोटा की पहचान खुदकुशी न बनें
" बच्चें दो साल में कोटा से निकल जाते हैं,कोटा सालों तक बच्चों से नहीं निकलता।" ये जीतू भैया का संवाद है जो बीते बरस आई वेब सीरीज कोटा फैक्ट्री का है।हाँ वही कोटा फैक्ट्री जहाँ से हजारों आई.आई.टी व मेडिकल में दाखिला पाते हैं।वहीं लाखों के सपनें किसी यूनिवर्सिटी व कॉलेज में दाखिले लेकर कोटा की दन्तकथाओं में बदल जाते हैं।ये दन्तकथायें टीवी व सड़कों की होर्डिंग्स पर जगजगाते चेहरों की न होकर उस चैम्बर में घुटकर दम तोड़ती खुशियों की होती है जो उनके जीवन में दसवीं पास के बाद से ही शुरू हो जाता है।जो आगे चलकर इतना स्याह हो जाता है कि पीछे लौटना मुश्किल हो जाता है व अपनी परेशानी साझा करने पर कमजोर का ठप्पा लगा दिया जाता न तो फलाने के लड़ने से तुलना हो सकती है क्योंकि पिता ने भी तो यही देखकर अपने लड़के को इस चैम्बर में भेजा है या हो सकता लड़का भी जोश में आ गया हो उस चका चौंध को देखकर जिसके पीछे का स्याह अन्धेरा वो न देख पाया हो।अभी आँखों में जब गड़ने लगा है तो उसे इसका एहसास हुआ।अब तो देर हो गयी है न क्योंकि वापस लौटना उपहास व हास्य का पात्र होना होता है और यहाँ मित्र भी प्रतिद्वंद्व...