कोटा की पहचान खुदकुशी न बनें
" बच्चें दो साल में कोटा से निकल जाते हैं,कोटा सालों तक बच्चों से नहीं निकलता।"
ये जीतू भैया का संवाद है जो बीते बरस आई वेब सीरीज कोटा फैक्ट्री का है।हाँ वही कोटा फैक्ट्री जहाँ से हजारों आई.आई.टी व मेडिकल में दाखिला पाते हैं।वहीं लाखों के सपनें किसी यूनिवर्सिटी व कॉलेज में दाखिले लेकर कोटा की
दन्तकथाओं में बदल जाते हैं।ये दन्तकथायें टीवी व सड़कों की होर्डिंग्स पर जगजगाते चेहरों की न होकर उस चैम्बर में घुटकर दम तोड़ती खुशियों की होती है जो उनके जीवन में
दसवीं पास के बाद से ही शुरू हो जाता है।जो आगे चलकर इतना स्याह हो जाता है कि पीछे लौटना मुश्किल हो जाता है
व अपनी परेशानी साझा करने पर कमजोर का ठप्पा लगा दिया जाता न तो फलाने के लड़ने से तुलना हो सकती है
क्योंकि पिता ने भी तो यही देखकर अपने लड़के को इस चैम्बर में भेजा है या हो सकता लड़का भी जोश में आ गया हो उस चका चौंध को देखकर जिसके पीछे का स्याह अन्धेरा वो
न देख पाया हो।अभी आँखों में जब गड़ने लगा है तो उसे इसका एहसास हुआ।अब तो देर हो गयी है न क्योंकि वापस लौटना उपहास व हास्य का पात्र होना होता है और
यहाँ मित्र भी प्रतिद्वंद्वी की तरह हमलावर है।इस कठिन समय में कोई सहानुभूति नहीं।तब बचा ही क्या ?क्यों इस उपहास व हास्य से मुक्ति न ले ले ।हमारा साथ तो पंखा व एक रस्सी दे ही सकता है......जीवन खत्म।जिसको आई.आई.टी के गेट पर होना था वो मृत्यु की गोंद में.........
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| प्रतीकात्मक तस्वीर स्रोत-adobe stack |
ये उस कोटा शहर की कहानी हो गयी है,बीते 12 दिसम्बर की रात तीन छात्रों ने ख़ुदकुशी कर ली।इस साल कुल 72 छात्रों ने खुदकुशी की है।अब इसमें किसको -किसको कशुरवार ठहराया जाये,कोचिंग संस्थान को,शिक्षा व्यवस्था को,सरकार को ,परिवार को या मित्रों को।क्योंकि कहीं न कहीं हम ने एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया है जहाँ जयकर सिर्फ जीते हुए की होती है ,पराजय पर सिर्फ उपहास की जयकार होती है।ऐसे में जब उस लड़के को सबसे ज्यादा सम्बल की जरूरत होती है तब हम दुत्कार देते हैं।मित्र भी इस यथा स्थिति को मनोरंजन का साधन बना लेते हैं।जबकि थोड़ी सी भी परिवार
मित्र सह्रदयता दिखाएँ तो कम से कम इस तरह की
घटना होगी व कोचिंग संस्थानों को भी एक परिष्कृत माहौल देना होगा जहाँ छात्र कम्पीटिटर मशीन न बनें बल्कि साथी बनें जो अपने साथ वाले को हमेशा सकारत्मक महसूस कराता रहें
क्योंकि उस चैम्बर में मित्र ही हमारी पूंजी होते है व सबसे करीब भी ......
बाकी सरकारों को, नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि चुनाव में उनके लिए ये कोई मुद्दा नहीं होता। अब हमारा कर्त्तव्य है की हम इस तरह के मसले पर पुनर्विचार करें व सार्थक कदम उठाने के लिए सरकार ,कोचिंग संस्था को उचित कदम उठाने के लिए मजबूर करें।

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