सादगी सार्वभौमिकता का सार है -गांधी
गांधी चरखे के साथ लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन के बाहर निकला तो गुनगुनी धूप थी, अमूमन मई के महीने में दिल्ली के मौसम में ठंडी हवा का मौसम न होकर ताप की हवा चलती है।लेकिन उस रोज़ मौसम खुशनुमा था इसलिए चौराहे से पार जाकर तुगलक रोड की ओर पैदल पथ पर बढ़ चला,घने घने पेड़ सड़क के दोनों तरफ और दोनों तरफ भारत सरकार के मंत्रियों और जजों के घर और घरों के भीतर घार के आम पर सुरक्षा ऐसी जैसे एयरपोर्ट पर चल रह हूं।अंतिम अरण्य में इन्हीं घरों का वर्णन करते हुए निर्मल वर्मा ने लिखा है "सूरज पर कोई बादल अटका था,एक थकी सी छांह शहर पर चली आई थी।सरकारी बंगले,चारो तरफ हरे लॉनस के समुद्र के बीच वे सफेद स्टीमर की तरह खड़े रहते हैं।"तो यही देखकर आगे बढ़ता रहा ,सीधे जाने पर 30 जनवरी मार्ग दिखा उधर ही मुड़ गया।सामने सड़क के उस पार 'राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय' का भवन दिख रहा था और सड़क के दाहिनी ओर धवल बिड़ला हाउस, जिसमें अंदर दाखिल हो गया।अंदर जाने पर सामने चरखेऔर चरखे के साथ गांधी की मूर्ति लगी थी,दूसरी छोर पर मकान के ऊपर एक शिलापट्ट था जिस पर अंकित था गांधी अपने जीवन के अंतिम 144 दिन...