सादगी सार्वभौमिकता का सार है -गांधी
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| गांधी चरखे के साथ |
"सूरज पर कोई बादल अटका था,एक थकी सी छांह शहर पर चली आई थी।सरकारी बंगले,चारो तरफ हरे लॉनस के समुद्र के बीच वे सफेद स्टीमर की तरह खड़े रहते हैं।"तो यही देखकर आगे बढ़ता रहा ,सीधे जाने पर 30 जनवरी मार्ग दिखा उधर ही मुड़ गया।सामने सड़क के उस पार 'राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय' का भवन दिख रहा था और सड़क के दाहिनी ओर धवल बिड़ला हाउस, जिसमें अंदर दाखिल हो गया।अंदर जाने पर सामने चरखेऔर चरखे के साथ गांधी की मूर्ति लगी थी,दूसरी छोर पर मकान के ऊपर एक शिलापट्ट था जिस पर अंकित था गांधी अपने जीवन के अंतिम 144 दिन यहीं ठहरे थे।गांधी ने बिड़ला हाउस का ही चयन क्यों किया दिल्ली में रहने के लिए ,गांधी लिखते है "बिड़ला हाउस क्यों ?"मेरे एक मित्र ने मुझको लिखा है कि बहुत सारे ग़रीब लोग बिड़ला हाउस में प्रार्थना में शामिल होने के लिये नहीं आ सके। उन्होंने पूछा कि मैं पहले की तरह भंगी बस्ती में क्यों नहीं रहने गया। दिल्ली आने पर मैंने इसका कारण बताया था किन्तु मैं इसे दोहराना चाहूँगा। जब मैं दिल्ली पहुँचा तो वह एक मृत शहर की तरह थी। अभी -अभी दंगे भड़के थे और भंगी बस्ती शरणार्थियों से भरी हुई थी। अतः सरदार पटेल ने मुझे भंगी बस्ती के बजाय बिड़ला हाउस में रखने का निर्णय किया। मुझे नहीं पता कि भंगी बस्ती अब खाली है या नहीं अगर यह खाली भी हो तो भी मैं नहीं समझता कि वहाँ रहना मेरे लिये उचित था । दिल्ली में रहने का मेरा मुख्य उद्देश्य मुसलमानों को ज़्यादा से ज़्यादा सुविधा और सहायता उपलब्ध कराना था। बिड़ला हाउस में रहकर यह उद्देश्य बेहतर ढंग से पूरा हो रहा है। मेरे मुस्लिम मित्र अन्य स्थान पर जाने के बजाय यहाँ आना ज़्यादा सुरक्षित समझते थे। दूसरे, केबिनेट के सदस्यों के लिये मुझसे बिड़ला हाउस में मिलना सुविधाजनक था क्योंकि उनमें से अधिकतर पास में ही रह रहे थे। वे वर्तमान परिस्थिति में बहुत व्यस्त लोग हैं और उन्हे भंगी बस्ती जाने में बिड़ला हाउस आने की अपेक्षा काफी अधिक समय लगता।"
मो. क. गांधी 9 दिसम्बर, 1947
इसी बिड़ला हाउस के अंदर दाखिल होने पर गांधी से जुड़ी स्मृति शेष थाती को सहेजा गया है।आगे बढ़ने पर गांधी का शयन कक्ष है जहां गांधी दिल्ली प्रवास के समय ठहरते थे।उसके आगे गांधी के जीवन के विविध प्रसंगों को चित्रों से रेखांकित किया गया हैं।जिसमें गांधी के मूल्यों और सिद्धांतों को भी उन्हीं के शब्दों में चित्रण किया गया है।जिसमें चर्खा और खादी,राष्ट्रीय पहनावा ,ग्राम- आंदोलन क्यों?मेरा समाजवाद,स्वदेशी और ग्राम -स्वराज,सीमित आवश्यकताओं से जुड़े जीवन की अपील ,स्थायित्व की अर्थव्यवस्था ,अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र,महिलाओं को शिक्षा का अधिकार और यौन शिक्षा आदि।गांधी यौन शिक्षा पर लिखते है "जिस यौन शिक्षा का समर्थन मैं कर रहा हूं उसका ध्येय काम के आवेग को जीतना और उसका उदात्तीकरण होना चाहिए।इस शिक्षा से बच्चों के मन में अपने आप यह बात घर कर जानी चाहिए कि मनुष्य और पशु के बीच में एक मौलिक भेद है और वह यह कि प्रकृति ने मनुष्य को सोचने और महसूस करने ,दोनों की योग्यताएं देकर विशेष रूप से उपकृत किया है।" इधर हाल के वर्षों में गांधी की इस शिक्षा को गांधी के जीवन में ही झांकने को लेकर तीन चार किताबें आई हैं जिसमें अरुंधति की The Doctor and The Saint, अलका सरावगी की गांधी और सरलादेवी चौधराइन: बारह अध्याय व तीसरी सुप्रिय पाठककी मीराबेन :गांधी की सहयात्री।इसके इतर क्ले मॉडल से भी गांधी की कथा को प्रदर्शित किया गया है।जिसमें गांधी के रंगभेद के शिकार से लेकर कौमी एकता के उपवास तक को प्रदर्शित किया गया है।यही नहीं गांधी के ग्राम्य जीवन के पहलुओं को दूसरी मंजिल पर बड़ी खूबसूरती से उकेरा गया है और ग्राम्य जीवन पर गांधी लिखते है "ग्राम आंदोलन जितना शहरवासियों के लिए शिक्षाप्रद है ,उतना ही ग्रामवासियों के लिए ।गांव की सेवा स्वराज की स्थापना का माध्यम है ।बाकी सब कुछ दिवा स्वप्न के समान है।"यहां से बाहर निकल कर आगे की तरफ बढ़ेंगे तो गांधी के कदमों के निशान बने है ,जो उस तरफ जाते है जहां वो प्रार्थना करते थे।यही वो प्रार्थना स्थल है जहां शाम के समय 30जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या को अंजाम दिया। कुलदीप नैयर अपनी पुस्तक स्कूप में इस घटना का विवरण कुछ यूं देते है ,सिर्फ़ तीन महीने का था और पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान से निकलने वाले उर्दू दैनिक 'अंजाम' में काम करता था; यही वह समय था जब मैं पत्रकारिता में अपना करियर शुरू कर रहा था। यह एकमात्र ऐसी नौकरी थी जो मुझे जल्दी मिल सकती थी। हालाँकि मेरे पास लाहौर से कानून की डिग्री थी, लेकिन मेरी खासियत फ़ारसी में डिग्री और उर्दू का ज्ञान था। मैं तब बाईस साल का था।बिना किसी अनुभव के रिपोर्टर-कम-सब-एडिटर बनने से रोमांचित, मैं दफ़्तर में न्यूज़ एजेंसी के टिकर के इर्द-गिर्द घूमता रहता और इस बात पर अचंभित होता कि यह कितनी तेज़ी और लगातार शब्दों को उगलता है। 30 जनवरी की दोपहर एक ऐसा ही मौक़ा था। मैं टिकर के पास था। घंटी बजी- यह एक न्यूज़फ़्लैश था। उन दिनों न्यूज़ डेस्क का ध्यान किसी भी अप्रत्याशित और महत्वपूर्ण स्टोरी की ओर खींचने के लिए इसी तरह का उपकरण इस्तेमाल किया जाता था।
'गांधी शॉट!'
आगे नैयर लिखते है ,बलदेव सिंह ने माउंटबेटन से कहा, "भगवान का शुक्र है कि हत्यारा पंजाबी नहीं था।" "वह मुसलमान भी नहीं था और हम ये तथ्य इसलिए प्रसारित कर रहे हैं क्योंकि कई शहरों में पहले से ही तनाव है।" गांधीजी के बारे में बात करते हुए माउंटबेटन ने एक बार कहा था कि वे ईसा मसीह या गौतम बुद्ध जैसे थे। सत्ता हस्तांतरण के उथल-पुथल भरे दिनों में जब भी वे गांधीजी से मिले, तो उन्होंने इस बात को महसूस किया।"
आज उसी जगह पर खड़े होकर गांधी को विनीत भाव से प्रणाम करता हूं ,सामने गांधी की छवि और सायास उपस्थिति देती है।पश्चिम की ओर हलचल बढ़ जाती है ।गांधी हाल में वेदांत पर व्याख्यान के लिए 'कर्ण सिंह 'आ रहें है और ऐसा लगता है कि गांधी की प्रार्थना सभा का समय हो चला है और याद आता है एक कोट जो गांधी के शयन कक्ष में लिखा गया था "सादगी सार्वभौमिकता का सार है।"
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| गांधी जी को जहां गोली मारी |
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| क्ले से गांधी जी के घटना के प्रसंग |
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| गांधी इसी कमरे में रूकते थे |
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| बिड़ला हाउस जहां गांधी अपने आखिरी 144 दिन रहे |
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| सड़क जो तीस जनवरी मार्ग के नाम से जानी जाती है |
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| कर्ण सिंह , वेदांत पर व्याख्यान देते हुए |







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