दिल्ली दरबार
साल 1876 का था,भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन (1876-
1880)थे।जो एक विख्यात कवि,उपन्यासकार व निबंध लेखक थे जिन्हें साहित्य जगत मेंओवनमैरिडिथ (OwenMeredith) के नाम से जाना जाता था।इन्हीं के शासन में एक भीषण अकाल आया था जिससे मद्रास,बंबई ,मैसूर ,हैदराबाद ,मध्यभारत के कुछ भाग व पंजाब प्रभावित हुए थे।इसी के बाद 1880 में लॉर्ड स्ट्रैची के नेतृत्व में एक अकाल आयोग का गठन किया गया था।जिससे अकाल के दिनों में दी जाने वाली सहायता पर विचार हो सके।वहीं साल1876 में 'प्रिंस ऑफ वेल्स 'दिल्ली पहुंचे और उसी साल शाही सभाआयोजित होनी थी जिसमें विक्टोरिया को भारत की शाही साम्राज्ञी की उपाधि दी जाने की घोषणा थी।प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता भी लिखी है -
आओ आओ हे जुवराज।
धन-धन भाग हमारे जागे पूरेसब मन-काज॥
कहँ हम कहँ तुम कहँ यह दिन कहँ यह सुभ संजोग।
कहँ हतभाग भूमि भारत की कहँ तुम-से नृप लोगा॥
इसी समय लॉर्ड लिटन की दिल्ली में सार्वजनिक उपस्थिति होती है।जिसके बाद 1जनवरी 1877 को चुने हुए स्थान राजपुर छावनी के उत्तर में बुराड़ी में शाही सभा आयोजित की गई।इससे पहले विभिन्न मनोरंजन के कार्यक्रम के बाद एक राजकीय भोज(1जनवरी)शासक सरदारों का विदाई समारोह(4जनवरी)
,एकत्रित सैनिकों की सामान्य समीक्षा (5जनवरी) के बाद शाही सभा के समापन का समय आ गया।इसके अलावा 63 शासक सरदार ,कलात के खान,पुर्तगाली गर्वनर व अन्य दूसरे देशों के राजदूत भी उपस्थित रहे।इसी समय महारानी विक्टोरिया को भारत की शाही साम्राज्ञी की उपाधि दी गई।इस उपाधि के बाद भारतेंदु ने विक्टोरिया के लिए भी कई कविताएं लिखीं।इसके अलावा ग़ज़ल में भी विक्टोरिया को बधाई दी गई है -
उसको शाहनशाही हर बार मुबारक होवे।
कैसरे हिंद का दरबार मुबारक होवे।।
बाद मुद्दत के हैं देहली के फिरे दिन या रब।
तख़्त ताउस मिलाकर मुबारक होवे।।
पर इन सबके मध्य विक्टोरिया को शाही साम्रज्ञी की उपाधि उस वक्त दी गई जब भारत भीषण अकाल से जूझ रहा था।इस पर कलकत्ता से निकलने वाले अख़बार ने कुछ यूं टिप्पणी की "जब रोम जल रहा था तब नीरो बंशी बजा रहा था। ऐसे पहला दिल्ली दरबार समाप्त हुआ ,वहीं दिल्ली दरबार का दूसरा मौका आया लॉर्ड कर्जन के समय (1899-1905)जिसके बारे में मोंटेग्यू ने टिप्पणी की थी कि "कर्जन उस मोटर चालक के समान है,जो रोज गाड़ी चमकाता है पर उन्हें पता नहीं कि जाना कहां है।"यही नहीं कर्जन अपने बारे में कहता था कि मैं वायसराय बनने के बाद कलकत्ता का महापौर बनना चाहूंगा।"इसी के शासन में एक और भव्य दिल्ली दरबार आयोजित हुआ जिसमें भारतीय शासकों के अलावा ड्यूक ऑफ कनॉट और ड्यूक ऑफ डचेस अपने कई ब्रिटिश गणमान्य लोगों के साथ उपस्थित हुए थे,जिसमें किंग एडवर्ड सप्तम को भारत का ब्रिटिश सम्राट बनाए जाने की घोषणा होनी थी।ये दरबार पहले हुए दिल्ली दरबार से ज्यादा बड़ा और ज्यादा संख्या में हुआ,इसका समापन 10जनवरी 1903 कोड्यूक ऑफ कनॉट और ड्यूक ऑफ डचेस के जाने के साथसमाप्त हुआ।इसके बाद कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा कर दी जो बंगाल व पूर्वी बंगाल में बंटा था।जहां एक तरफ बंगाल में बहुसंख्यक हिन्दू आबादी थी और गैर बंगाली कम वहीं पूर्वी बंगाल में बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी थी जिसकी राजधानी ढाका थी।पूर्वी बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर बेमफायल्ड फुल्लर ने मुसलमानों को अपनी चहेती पत्नी के रूप में उल्लेख किया।बंगाल विभाजन भी धार्मिक आधार पर हुआ और अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का ही उद्धरण है।ये वहीं समय जब बंगाल में राष्ट्रीय चेतना उभर रही थी और अंग्रेज इसे किसी तरह दबाना चाहते थे इसलिए भी उन्होंने विभाजन का रुख किया।यही नहीं यहां से उदारवादियों के दौर का भी अंत हो रहा था और राष्ट्रीय पटल पर उग्रवादियों का आगमन जिसमें बाल गंगाधर तिलक ,लाला लाजपत राय व विपिनचंद्र पाल का नाम अग्रणी हैं।इसके बाद स्वदेशी आंदोलन ,मुस्लिम लीग का गठन,सूरत में कांग्रेस का विभाजन, मार्ले मिंटो सुधार आदि बड़ी घटनाएं घटी।इसके इतर बंगाल व पंजाब में क्रांतिकारी गतिविधियां जोरों पर थीं।ऐसे ही समय में दिसंबर ,1911 में ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम व महारानी मेरी भारत आये।उन्हीं के स्वागत में एक और दिल्ली दरबार का आयोजन हुआ।जार्ज पंचम ब्रिटिश शासन काल में। भारत आने वाले एकमात्र ब्रिटिश सम्राट थे। दिल्ली दरबार में 12 दिसंबर ,1911 को सम्राट ने बंगाल विभाजन करने की घोषणा की तथा कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को भारत की नई राजधानी बनाने की घोषणा की..
दिल्ली जो आजकल भारत की राजधानी कम भारत के प्रदूषण की राजधानी की ख्याति बटोर रही है,उसके बावजूद यहां इतिहास के गवाह बहुतेरे अवशेष आज भी मौजूद है।कुछ की हालत जहां दुरुस्त हैं वहीं कुछ ज़मीं दोज होने के कगार पर हैं।ऐसे ही तीन दिल्ली दरबार का साक्षी रहा कोरोनेशन पार्क है,जहां
ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज अस्त हो चुका है और वहां लगी प्रतिमाएं धूमिल हो रहीं हैं और उनके शिलापट्ट पर सादा हो गए हैं जिससे आपको ज्ञात नहीं होता कि प्रतिमाएं किस वायसराय की हैं?इन सबके बीच में सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर जाने पर एक ऐतिहासिक स्तंभ है जिस पर दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा का शिलापट्ट अंकित है जिसमें एक तरफ अंग्रेजी में उद्घोषणा है वहीं दूसरी तरफ उर्दू में जिसके इर्द गिर्द
दिलों का स्तंभ भी बन गया है,जहां प्रेमी अपना अभिलेख उत्कीर्ण करके पुरातत्वविदों के लिए प्रेम के स्त्रोत छोड़ गए हैं।
इसके ठीक सामने एक धवल प्रतिमा है जिस पर सूर्य का अंकन है और प्रतिम पर जार्ज पंचम लिखा हुआ है,इसके आस पास तीन चार और प्रतिमाएं हैं जो ऊंचाई में इससे छोटी है,जो वायसराय की प्रतीत होती हैं.....वहीं दूसरी तरफ ओपेन जिम है जहां दिल्ली की मध्यमवर्गीय जनता इकट्ठी है,इसके आस पास छोटे बच्चों का अपना खेल चल रहा है।जैसे सूरज पश्चिम की ओर बढ़ रहा है पार्क में लोगों की संख्या वैसे वैसे बढ़ती जा रही हैं और दूर से देखने पर स्तंभ जो कई सीढ़ियों के मध्य में है जहां कुछ लोग खड़े हैं और उसके ठीक नीचे की ओर जन समूह एकत्रित दिखता है।ऐसा प्रतीत होता है कि साल 1912 का है और लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय घोषणा कर रहा है और नीचे एकत्रित जन समूह उसे सुन रहा है।इसके अतिरिक्त पार्क के बाहर एक राष्ट्रीय स्मारक है जिस पर हार्डिंग की घोषणा लिखी है,जहां शाम में एक बंधु अपना समान स्थिर करके वहां अपना ठेला लगा रहें है ।सुदूर पश्चिम में सूरज अस्त होने की ओर बढ़ चला है।
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| कोरोनेशन पार्क के बाहर |
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| स्तंभ जिस पर राजधानी परिवर्तन की उद्घोषणा लिखी है |
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| उर्दू में |
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| अंग्रेजी में |
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| जॉर्ज पंचम की मूर्ति जो कभी इंडिया गेट पर हुआ करती थी। |
नोट-अधिक जानकारी के लिए आप इन्हें पढ़ सकते हैं
1.CITY OF DJINNS -William Dalrymple
2.Delhi Gazetier 1912
3.Rajrajeshwari Rajbhakti- Shubhaneet kaushik
4.Modern History -Bl grover






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