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मदन काशी

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  सोपान जोशी की हाल ही में आई किताब मैग्नीफेरा इंडिका आमों के विविध किस्म व उनके इतिहास की पड़ताल है।इसी पुस्तक के ऊपर बातचीत करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने अमराई व बगीचों के अंतर को भी स्पष्ट किया है।साथ ही साथ अमराइयों के मध्य लड़ाइयों का भी जिक्र किया।इसी अमराई से मुझे एक निबंध की स्मृति मानस पटल पर अवतरित हो गई जिसका नाम है मदन काशी जिसे शिवप्रसाद सिंह ने लिखा है। यों तो मुझे दो काशी के बारे में जानकारी थी ,एक बनारस वाली काशी व दूसरी उसकी सीमा से लगती लहुरी काशी ,पर तीसरी काशी से मैं अनभिज्ञ था।जबकि मेरा निवास स्थान इसी पवित्र रमणीय स्थल में है।उसके इस महात्म्य के विषय में कुछ कहानियां सुनी थी,पर इससे अधिक जानकारी मेरे हिस्से कभी आई नहीं।ये निबंध उस कच्ची जानकारी को पूर्ण करता है...... कथा है कि श्रवणकुमार अपने मां -बाप की बहंगी उठाए सकल तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे,तब वह जमानियां पहुंचे।उन्होंने कस्बे के पास घनी अमराई देखकर बहंगी उतार दी।यहां की शीतल छाया में उन्होंने आराम किया ।उसके बाद श्रावणकुमार की बुद्धी पथभ्रष्ट हो गई। उन्होंने कहा कि बूढ़ा- बूढ़ी आप लोग के ताबूत को...

गाज़ीपुर के राजकुमार!

  एक सड़क हादसे में पिता की देह नहीं रही।घर पर परवाह के लिए रूपये तक नहीं है।भला हो तेजू भइया का जिन्होंने इस कठिन समय में परिवार का ख्याल रखा।उस बात को झुठलाया कि बनला क सब बिगड़ला क केहू नाही।बहरहाल ये वही तेजू भइया जिनका एक स्टेडियम है जिसका नाम मेघबरन सिंह स्टेडियम करमपुर है।यहीं पर दो भाई राजू व जोखन खेला करते थे,उनका तीसरा भाई राज उनका खेल देखता था।उसके पास हॉकी स्टिक नहीं थी।बांस के स्टिक से खेला करता था।पर आज  उनके हाथ में एक कांसा है और पूरा गाजीपुर उसे छू लेना चाहता है ,मेडल कैसा होता है?पर राजकुमार का सफर इतना आसान नहीं था।उनको भी लोग कहते थे , ई कुछों ना करीहन , ई छोड़ के पढ़ाई लिखाई कर।अब तनी हमारे लईका के हॉकी सिखा द।