दीक्षांत का उत्सव

नींद की घानी पूरी हो गयी है या देह से कम्बल किसी ने झटक अपनी देह को ओढ़ा दिया है।ऐसा ही हुआ है न!क्योंकि कमरा उन नायाब तबीयत से भर गया है जिनके होने से जीवन सबेर की चिड़ियों के कलरव जैसा लगता है!जो सब शरीक होने आये हैं दीक्षांत के उत्सव में।  
    
         
तस्वीर -BHUPRO(TWITTER)


जी बीते तीन वसन्त बाद उत्सव हो रहा है इसलिए भी उत्साह तीगुना है।इस उत्सव व उत्साह में आत्मा जगजावे,नींद का क्या ?
सबेर से ही जलसे की तैयारी आरम्भ है,कभी कंघी न मिलती ,कभी किसी को सीसा न मिलता व देर से जगने वालों की हड़बड़ी हमारा प्रेस किया हुआ कुर्ता चिमुड़ाया तो जान ही लूँगा!वाह -वाह कुर्ते से तस्वीर चकामाका न आएगी बल्कि ठण्ड के प्रसाधनों से रूखी त्वचा को स्नान कराने से आयेगी।बक्क बेवकूफ!तस्वीर तो ........मुस्कान से भी आ सकती है!
मुस्कान तो आई कुर्ते को पहनने पर किसी के लाद पर चढ़ जाये, किसी के घुटनों से भी नीचे आ जाये!पर फ़र्क नहीं पड़ता शरीर पर उत्तरीय व साफा इस कमी को भर देता
नौकरी का सूट भी शायद इतना न फबे जो अभी कुर्ता फब रहा है!
     
डीजे की गूंज हो रही है, हॉस्टल के नीचे सरसों के फूल की तरह नाचते दीखते हैं सब लोग।अब कारवाँ आगे बढ़ेगा मन्थर -मन्थर जिसमें नाचना भी होगा बतियाना व तस्वीर तो बमचक खिंचानी है क्योंकि कुर्ते में जो राजा बनारस दिख रहें है!
स्वतन्त्रता भवन पहुँच गया है जलसा ,खूब सजा है व सब सरसों की पीयरई की तरह दीखते हैं।अंदर सब करीने से सजा है ,थोड़ी ही देर में कुलगीत होगा फिर विधिवत डिग्री वितरण का कार्यक्रम शुरू।
यही तो है दीक्षांत न जब हम सब मुदित होते हैं; दूसरे की ख़ुशी में शरीक होते है हर्ष,आनन्द व उत्साह के साथ!
यही है दीक्षांत का उत्सव जो 
डिग्री के साथ आगे बढ़ता रहेगा व यही सीख ,यही उत्साह जीवन में आगे बढ़ता रहे।उत्तरीय व साफा आकाश में ,हर हर महादेव!
 

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