कुछ तस्वीरें कुछ यादें

 


यह जानते हुए भी।            

दरख़्तों की छायाएं

कि आगे बढना

निरंतर कुछ खोते जाना

और अकेले होते जाना है

मैं यहाँ तक आ गया हूँ

जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं

मुझे घेरे हुए हैं......  अज्ञेय


चूल्ह


कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त-नागार्जुन

                          
सितम्बर में बलरामपुर में आई बाढ़
 मैंने एक बार अनुपम मिश्र से पूछा था, "बाढ़ क्यों आती है?" 
वे बोले: "पानी की अपनी स्मृति होती है. आप उसे उसकी जगह से हटायेंगे, वह लौट कर आ जाएगा."(आशुतोष भारद्वाज ट्विटर)


      





           

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