काशी -तमिल संगमम

मोदी जी ने अपनी एक रैली में रेवड़ी कल्चर की बात फिर पूरे देश में चर्चा हुई छनकर शब्द आया फ्रीवाइब्स।इसके बाद क्या-क्या हुआ आप को पता है हालांकि राजनीति में इसका सफल प्रयोग व इसके लाभ को भुनाने की कोशिश कहाँ हुई ?तमिलनाडु में इसे कारगर बनाया जयललिता ने।उन्होंने अपने घोषणा -पत्र में वायदा किया की सरकार बनने के बाद सबको कलर टेलीविजन मिलेगा।उस समय कलर टेलीविजन बड़ी बात हुआ करती थी।अब तो उसी का छोटा रूप स्मार्टफोन सरकारें धड़-धड़ बाँट रहीं,इसके साथ ढ़ेर सारे उपक्रम और चालू हैं।चूँकि अगले साल के बाद चुनाव है तो सब पार्टियां अपनी -अपनी रणनीति साध रहीं हैं।कोई बिहार से दिल्ली जा रहा है, कोई मुंबई से बिहार कोई तेलंगाना व बंगाल एक कर रहा है, कोई जनस्वराज में
व्यस्त है व कोई भारत जोड़ने में या गुटबाजी के मसले को हल करने में इस प्रदेश से उस प्रदेश मार्च कर रहें है?
एक प्रदेश और उसकी नगरी राजनीति का केंद्र बिंदु बनी है
काशी जहाँ आजकल काशी-तमिल संगमम हो रहा है।
           
काशी -तमिल संगमम् में सांस्कृतिक प्रस्तुति देते कलाकार





विद्वानों का मानना है की राजनीति के समीकरण में वोटों की बढ़ोत्तरी व तमिलनाडु में सीटों की संख्या को बढ़ाने के लिए ये पहल है।
वहीं शिक्षा मंत्रालय का कहना है की काशी-तमिल एक साझा विरासत साझा करती है व इनके मध्य सांस्कृतिक प्राचीनता भी रही है ,इसलिए एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति से परिचित होने का अवसर है।
यदि हम प्राचीन भारत के इतिहास को देखें तो भी ढ़ेर सारे विवरण मिल ही जाते हैं।
यदि साहित्यिक स्रोत को देखें तो तमिलनाडु की एक कहानी से भी दोनों संस्कृति के तार जुड़ते हैं।कहानी में एक लड़की की नई शादी होती है कुछ दिनों बाद उसका पति काशी की यात्रा पर आता है फ़िर लौट न पाता है।नई शादी में इस तरह की अनहोनी हो जाये तो लड़की को कौन -२से कटाक्ष सुनने होते हैं सबको पता वही उनके साथ भी होता।आख़िर में कहानी में वो
बुजुर्ग हो गयी रहती है कब पके आम की तरह टपक जाये पता न।फिर काशी से एक व्यक्ति आता है गंगाजल के साथ और उनको पूरी घटना बताता है की कैसे उनके पति ने १८५७(1857)की क्रान्ति में उसके दादा की जान अपनी जान देकर बचायी थी।उनका मरना कम से कम शुभ हो सकता है !बिनाअपराध बोध के।कहानी का एक टुकड़ा"
सहसा एक दुकान के बोर्ड पर मेरी नजर पड़ी।उस पर लिखा था-भगवानदास वीरास्वामी कौशिक बनारसी रेशम के व्यापारी।"
बनारस न रहने का यही मलाल है बाकी चार्ल्स डिकेन्स ने A Tale of Two Cities में लिखा है It was the best of the times ,it was the worst of times.जो वहाँ है उनके ऊपर पहला पैरा सेट करता है जो न उनके लिए कॉमा के बाद वाला।


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