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Showing posts from November, 2022

काशी -तमिल संगमम

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मोदी जी ने अपनी एक रैली में रेवड़ी कल्चर की बात फिर पूरे देश में चर्चा हुई छनकर शब्द आया फ्रीवाइब्स।इसके बाद क्या-क्या हुआ आप को पता है हालांकि राजनीति में इसका सफल प्रयोग व इसके लाभ को भुनाने की कोशिश कहाँ हुई ?तमिलनाडु में इसे कारगर बनाया जयललिता ने।उन्होंने अपने घोषणा -पत्र में वायदा किया की सरकार बनने के बाद सबको कलर टेलीविजन मिलेगा।उस समय कलर टेलीविजन बड़ी बात हुआ करती थी।अब तो उसी का छोटा रूप स्मार्टफोन सरकारें धड़-धड़ बाँट रहीं,इसके साथ ढ़ेर सारे उपक्रम और चालू हैं।चूँकि अगले साल के बाद चुनाव है तो सब पार्टियां अपनी -अपनी रणनीति साध रहीं हैं।कोई बिहार से दिल्ली जा रहा है, कोई मुंबई से बिहार कोई तेलंगाना व बंगाल एक कर रहा है, कोई जनस्वराज में व्यस्त है व कोई भारत जोड़ने में या गुटबाजी के मसले को हल करने में इस प्रदेश से उस प्रदेश मार्च कर रहें है? एक प्रदेश और उसकी नगरी राजनीति का केंद्र बिंदु बनी है काशी जहाँ आजकल काशी-तमिल संगमम हो रहा है।             काशी -तमिल संगमम् में सांस्कृतिक प्रस्तुति देते कलाकार विद्वानों का मानना है की राजनीति के समीकरण मे...

अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है

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 लंका से अस्सी जाने में जितना समय व खर्चा होता है न!उसी  आराम समय व खर्चे में आदमी अंतरिक्ष व धरती एक करेगा। ऐसा आने वाले कुछेक दशक में भारत में भी होने लगेगा ऐसा विद् जनों का कहना है!हाल ही में एक प्राइवेट कम्पनी स्काईरुट ने इसरो के साथ मिलकर विक्रम एस लॉन्च भी विक्रम एस  किया है।जो भारत में इस तरह का पहला प्रयोग रहा है ,इससे पहले अमेजान व स्पेसएक्स ने बड़े उद्योगपतियों को अंतरिक्ष की सैर करा दी है।भारत में इस तरह के प्रयोग के सफल होने व अंतरिक्ष में ऊपर से भारत को देखना अद्भुत होगा।क्योंकि यहाँ आदमी सिर्फ़ जीके का प्रश्न रटता रहा है अंतरिक्ष में  जाने वाले पहले भारतीय का क्या नाम था -राकेश शर्मा  जीके से आगे बढ़ा तब पता चला इन्दिरा जी ने राकेश शर्मा से प्रश्न पूछ लिया था:ऊपर से भारत कैसे दिखता है राकेश शर्मा :सारे जहाँ से अच्छा ! समय के साथ परिप्रेक्ष्य बदल जाते है ,अब कोई दूसरा अंतरिक्ष जाएगा उससे ये प्रश्न पूछे तो क्या वो इतना मौलिक उत्तर दे पाएगा?

इतिहास का भूला नायक

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  लचित बरफुकन मध्यकालीन भारत का इतिहास पढ़े तो दिल्ली सल्तनत ,मुग़ल राजवंश ,मराठा ,विजयनगर व मोटा-माटी प्रांतीय राज्यों के बारे में है।आप किसी की पुस्तक उठा लीजिये उसमें इतना मिल ही जाएगा,इसी क्रम में जब औरंगजेब को पढ़ते है तो उसके ढ़ेर सारे आयामों पर विस्तार से चर्चा मिलती है जैसे -धार्मिक नीति, जजिया विवाद ,राजपूत नीति दक्षिण अभियान ,मराठे व उसके समय हुए विद्रोह।उसके विजय अभियान में असम एवं पूर्वी भारत का जिक्र आता है।ये अभियान अहोम शासकों के साथ था और ये अभियान लम्बा चला जिसमें मीर जुमला नायक है..... आज जब एक अहोम शासक लचित बरफुकन की 400 वीं जयंती मनाई जा रही है व हम थोड़ा सा इतिहास में उनके बारे में न पढ़ पाये। इन्हीं के नाम पर NDA के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को स्वर्ण पुरस्कार दिया जाता है।पर हमारी किताब में थोड़ सा भी स्थान इस नायक को नहीं मिला है।हमें तो उनके बारे में  शुभ्राष्ठा की किताब बैटल ऑफ सरायघट से जाना की ये लड़ाई किसके मध्य हुई थी व किताब से असम की राजनीति भी थोड़ी बहुत समझ आई व पूर्वोत्तर के बारे में एक दिलचस्पी जगी। जो आगे अब बढ़ रही है क्योंकि असम से हमारे मित्र व असम के गम...

क़तर फुटबॉल विश्वकप

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 नेटफ्लिक्स पर एक डॉक्यूमेंट्री है माय ऑक्टोपस टीचर जिसे देखने के बाद ऑक्टोपस से समानुभूति हो जाएगी।इससे पहले एक पॉल ऑक्टोपस था ,भविष्यवाणी करता था।फुटबॉल वर्ल्ड कप की ,उस साल उसकी भविष्यवाणी सही भी हुई ।टीवी पर उसी की ख़बरें ही दिखाई जाती और एक गाना वाका वाका उस साल खूब चला और अभी भी चलता है।यहाँ से पाश्चात्य गाने सुनने प्रारम्भ हुए और शकीरा के दीवाने भी हुए।वाका -वाका ज़बान पर चढ़ गया था और शकीरा पर परवान ,क्योंकि आगे मार्केज़ ने शकीरा पर लेख लिखा और उसे पढ़ने के बाद बाँछें खिल आई । टीवी पर पॉल की ख़बरें देखता व शकीरा का गाना सुनता।फिर फीफा देखना शुरू हुआ उस साल स्पेन का फाइनल भोर की वेला तक चला था।आखिर में आंद्रेस इनिस्ता के गोल से स्पेन विजयी हुआ और इधर नींद का आगोश आया।वहीं से फिर हर बार थोड़ा बहुत फीफा देखता हूँ ,इस बार भी फीफा देखा                   डूडल पर विश्वकप           जाएगा क्योंकि खेल देखने के बाद असफलता को पचाना और उससे आगे निकलना आसान हो जाता है। ख़ुद असफल हुआ हूँ और मनोवेग को उच्च रखने के लिए ...

सर्दियों में धूप

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सुबह -सुबह सूरज सर्द हवा चलने लगी है।धूप देर से निकल रही है ।हमारी तरह उसका भी कम्बल से निकलने का जी न चाह रहा हो।आराम किसे न सुखद लगता है?फिर भी हम जैसे -तैसे देर से निकलते है वो भी निकल ही आता है।हमारी तरह वो भी दिन के आरम्भ में मुचमुचाया रहता है।मानो उसकी आँख में भी किच्चर समाया हो ।कहीं देर तक वो भी व्हाट्सऐप पर ऑनलाइन रहा होगा या ट्विटर के ट्रेंड में शामिल रहा होगा?न देर रात तक पढ़ रहा होगा ,क्योंकि आजकल दिन छोटा हो रहा है?हम भी तो देर रात पढ़ते हैं क्योंकि रात्रि को हमारे मित्र हमें परेशान न करते हैं ।सिर्फ़ कभी -कभी गर्मा- गर्मा चाय के लिए इधर -उधर चला जाता हूँ।थोड़ा-बहुत व्हाट्सऐप पर स्टेट्स देख लेता हूँ,किसी को जवाब भी दे देता हूँ,किसी को जन्मदिन की बधाई भी लिख देता हूँ।वो भी कुछ ऐसा ही कर रहा होगा क्या?लेकिन मध्यान्ह के समय खूब चनका चमकता है।मानों आँखों से किच्चर साफ़ हो गया हो इसलिए साफ़ दिखने लगा हो,न मध्यान्ह की वजह से नहा- धो भोजन कर ऊर्जा मिल गयी हो। इसलिए चेहरा लाल दीप्त हो गया है बिलकुल बल्ब की तरह जल रहा है।खुले मैदान में धूप बड़ी सुहावन महसूस हो रही है।सर्द हवा में गर्मी लौ...

खलिहान में फ़सल की आमद

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        सुबह -सुबह सोया खलिहान  बड़ी -बड़ी घांसे उग आई हैं, सब कुछ कबाड़ सा दिख रहा है। जहाँ -तहाँ प्रकृतिवासियों ने अपना आशियाना बनाया है एक स्थान पर कुत्तियां ने बच्चें जने जो देखने में बड़े प्यार लगते है।मनहर सा स्वच्छ उज्ज्वल शरीर काले व सफेद मिश्रित रंग सा मोहक लगता है,छोटे बच्चें कान खींचकर चोर व ईमानदार का पता लगाकर उन्हें अपनी गोद में भरकर दौड़ पड़ते है ,हमारा कुत्ता व इनके ज़ोर से इनके मनपसंद नाम रखते है, अंग्रेजी का चलन है तो माइकल ,टमी और न जाने क्या?                                 खलिहान की चहल -पहल ख़ैर अब यहाँ ये सब न होगा क्योंकि फसल पकने लगी है,इतने दिनों से सोया खलिहान जग उठेगा।उस पर जल के छींटे तो पड़ेंगे ही साथ ही साथ फरसे से उसके इर्द -गिर्द जमी गन्दगी,कूड़े के ढ़ेर को हटा दिया जाएगा।गोबर से लिप -पोत उसका रंग रोगन हो जाएगा।फ़सल से उसका आँगन ढँक जावेगा। उसका अकेलापन भी कुछ दिनों तक न होवेगा।दिन-रात कुछ न कुछ लोग रहेंगे,यहाँ के बाशिंदे विस्थापित हो जावेंगे।फ़सल से भरा...

छायाचित्र की छाया में

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  आसिन-कातिक का सूरज दो बाँस दिन रहते ही कुम्हला जाता है। सूरज डूबने से पहले ही नननपुर पहुँचना है, हिरामन अपने बैलों को समझा रहा है - 'कदम खोल कर और कलेजा बाँध कर चलो ...  हमारे साथ ऐसा न है फिर भी समय से पहुँच जाना चाहिए। लेकिन यहाँ गाड़ीवान दुसरा है ,गाड़ीवान को कोई जल्दबाजी न है।वो आनन्द के साथ मन्थर -मन्थर चलने वाला है । जहाँ नयनाभिरामदृश्य दिख जाये पल भर ठहर का सजल नेत्रों से उसका पान कर आगे बढ़ना चाहता है। साथ में दो जन और है वो भी उसमें वैसे ही शरीक है जैसे दूध में मिश्री।हम भी अछूते न है सामने पड़े दृश्य या बातचीत इस नौउम्र में किसे न अच्छी लगेगी और साथ है तो हाँ में हाँ जरूर करनी होगी। ज्यादा मीन -मेख किया तो गाड़ीवान उतार भी देगा और फेसबुक पर स्टोरी लगाकर हमारी दुर्गति भी कर सकता है। इसलिए मन्थर -मन्थर ही सही आगे बढ़ा जाए और इस सफ़र का आनन्द लिया जाये। यहाँ आनन्द मानो सूख गया है कहीं भी कुछ न जो है सब उजाड़ और सूखा। कारण भी है  गाड़ीवान का मानना है की इस बरस उतनी बरसात न हुई है। धान जितना पहले रोपा जाता था इस साल उसका छठाँश भी न रोपा गया। इसलिए कहीं थोड़े बहुत धान और जहाँ...