क़तर फुटबॉल विश्वकप
नेटफ्लिक्स पर एक डॉक्यूमेंट्री है माय ऑक्टोपस टीचर जिसे देखने के बाद ऑक्टोपस से समानुभूति हो जाएगी।इससे पहले एक पॉल ऑक्टोपस था ,भविष्यवाणी करता था।फुटबॉल वर्ल्ड कप की ,उस साल उसकी भविष्यवाणी सही भी हुई ।टीवी पर उसी की ख़बरें ही दिखाई जाती और एक गाना वाका वाका उस साल खूब चला और अभी भी चलता है।यहाँ से पाश्चात्य गाने सुनने प्रारम्भ हुए और शकीरा के दीवाने भी हुए।वाका -वाका ज़बान पर चढ़ गया था और शकीरा पर परवान ,क्योंकि आगे मार्केज़ ने शकीरा पर लेख लिखा और उसे पढ़ने के बाद बाँछें खिल आई ।
टीवी पर पॉल की ख़बरें देखता व शकीरा का गाना सुनता।फिर फीफा देखना शुरू हुआ उस साल स्पेन का फाइनल भोर की वेला तक चला था।आखिर में आंद्रेस इनिस्ता के गोल से स्पेन विजयी हुआ और इधर नींद का आगोश आया।वहीं से फिर हर बार थोड़ा बहुत फीफा देखता हूँ ,इस बार भी फीफा देखा
जाएगा क्योंकि खेल देखने के बाद असफलता को पचाना और उससे आगे निकलना आसान हो जाता है।
ख़ुद असफल हुआ हूँ और मनोवेग को उच्च रखने के लिए
इस जुझारूपन खेल को देखूंगा ,सीख लूंगा आगे बढूंगा।
बहरहाल अल्बैर कामू यूनिवर्सिटी की टीम में गोलकी थे,सब बढ़िया चल रहा था। फिर एक रोज़ उनको टीबी हुआ,जिससे वो उभर न पाये।शरीर टूट सा गया था ,सांसे फूलने लगती।उनका फुटबॉल से नाता टूट गया। उन्होंने आगे लेखन में जो मुकाम बनाया जिसके लिए मात्र चौवालीस की उम्र नोबेल मिला।उन्होंने फुटबॉल से क्या -क्या सीखा और उसका असर उनके लेखन में भी हुआ।कामू एक जगह लिखते है "फुटबॉल से मैंने यह भी सीखा कि बिना खुद को ईश्वर जैसा महसूस किये जीता जा सकता है और बिना खुद को कचरा जैसा महसूस किये हारा भी जा सकता है।"
क़तर फुटबॉल विश्वकप २०२२(२०नवंबर -१८दिसम्बर)

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