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आपातकाल के 50 वर्ष

  लोकतंत्र प्रयोगशाला बन गया था जिसका प्रयोग संजय गांधी कर रहे थे ,जिसमें उनकी सहायक सारा की नानी रुखसाना सुल्तान थी।प्रयोग था नसबंदी का जिसे एक नारे में ऐसे व्यक्त किया गया "जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में. द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मर्द गया नसबंदी में।"दूसरी तरफ इंदिरा जी के लिए नारा लगता आधी रोटी खाएंगे , इन्दिरा जी को लाएंगे। इन्दिरा जी आ गई और उधर राजनरायन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैसला राजनरायन के पक्ष में।उस समय जज क्रांतिकारी हुआ करते उनके घर से जले नोट नहीं निकलते बल्कि फैसले से सियासी समीकरण बदल जाता। इन्दिरा जी ने अपने फैसले से लोकतंत्र को किया जिसे विनोबा भावे ने अनुशासन पर्व कहा वहीं दश द्वार से सोपान तक में हरिवंश राय बच्चन ने इसका समर्थन भी किया।लेकिन नागार्जुन ने बखियाँ उधेड़ दी ..... इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको  सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को   और जेपी के नारे संपूर्ण क्रांति ने इस अंधकार काल को उजाले से पाट दिया।

चोकर्स नहीं विजेता अफ्रीका

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 क्रिकेट में रिकॉर्ड बनते है टूटने के लिए,साल 2005 से लार्ड्स पर 200 के ऊपर टारगेट एक बार चेस हुआ है।लेकिन अफ्रीका इसी के लिए जानी जाती असंभव को संभव बना देना ,ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ400 का सफल चेस भी किया है।और लार्ड्स की जीत ने ICC ट्रॉफी के सूखे को खत्म किया पर उससे महत्त्वपूर्ण है कि  एक समय में डिकाक ने Apartheid के मुद्दे पर अलग राह पकड़ी और उनकी आलोचना उसके लिए आज भी होती है।ऐसे में बमुवा के नेतृत्व में ट्रॉफी जीतना उस कड़ी में भी महत्त्वपूर्ण जिसे मंडेला ने कुछ यूं कहा था  “I have fought against white domination, and I have fought against Black domination". अफ्रीका की उम्मीद  क्रेडिट sportskeeda अफ्रीकी टीम टेस्ट मेस के साथ क्रेडिट ICC Aiden makran Credit -ICC Trend मीम  Credit -x

गुरुग्राम

  निर्मल वर्मा के उपन्यासों में कुछ शब्द बारम्बार सामने प्रकट होते हैं जिसमें पीला आलोक एक प्रमुख शब्द है।इस पीले आलोक की अपनी व्याख्या हो सकती है लेकिन गुरुग्राम से समयपुर बादली के बीच येलो लाइन पर चलने वाली मेट्रोसे गुरुग्राम के आलोक को टटोला जा सकता है...GTB से साकेत तक मेट्रो भूमिगत ही चलती है।उसके बाद वो किसी पनडुब्बी की तरह कुतुबमीनार के पास ऊपर प्रकट होती है, जहां से सुदूर सूरज का पीला आलोक मेट्रो के साथ साथ आगे बढ़ता है,कभी उसके ऊपर विमान आ जाता है तो दृश्य और सुन्दर हो उठता है।इसके इतर कुतुब मीनार से ऊंचे घर ,घरों पर सफेद पानी की टंकी और इधर मेट्रो के भीतर ऑफिस से लौटते कार्पोरेट,प्रेमी युगल,रेडिफ पर न्यूज पढ़ते अंकल ,फोन पर लूडो खेलते पति पत्नी और दूर किसी रेड लाइट पर खड़ी कारों का हुजूम जिसमें लाल रंग में चमकती उनकी बैक लाइट जो ऊपर से और आभा में निखरी नज़र आती।इन्हीं रेड लाइटों पर भीख मांगते बच्चें और बंद शीशों को खुलवाते हिजड़े भी दिखाई देते हैं..... पर इन सबके बीच कुतुब मीनार से छतरपुर , सुल्तानपुर, घिटोरनी,अर्जनगढ़ और गुरु द्रोणाचार्य तक खूब सारे पेड़ भी दिखाई देते है...

सादगी सार्वभौमिकता का सार है -गांधी

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गांधी चरखे के साथ    लोक कल्याण मार्ग मेट्रो स्टेशन के बाहर निकला तो गुनगुनी धूप थी, अमूमन मई के महीने में दिल्ली के मौसम में ठंडी हवा का मौसम न होकर ताप की हवा चलती है।लेकिन उस रोज़ मौसम खुशनुमा था इसलिए चौराहे से पार जाकर तुगलक रोड की ओर पैदल पथ पर बढ़ चला,घने घने पेड़ सड़क के दोनों तरफ और दोनों तरफ भारत सरकार के मंत्रियों और जजों के घर और घरों के भीतर घार के आम पर सुरक्षा ऐसी जैसे एयरपोर्ट पर चल रह हूं।अंतिम अरण्य में इन्हीं घरों का वर्णन करते हुए निर्मल वर्मा ने लिखा है "सूरज पर कोई बादल अटका था,एक थकी सी छांह शहर पर चली आई थी।सरकारी बंगले,चारो तरफ हरे लॉनस के समुद्र के बीच वे सफेद स्टीमर की तरह खड़े रहते हैं।"तो यही देखकर आगे बढ़ता रहा ,सीधे जाने पर 30 जनवरी मार्ग दिखा उधर ही मुड़ गया।सामने सड़क के उस पार 'राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय' का भवन दिख रहा था और सड़क के दाहिनी ओर धवल बिड़ला हाउस, जिसमें अंदर दाखिल हो गया।अंदर जाने पर सामने चरखेऔर चरखे के साथ गांधी की मूर्ति लगी थी,दूसरी छोर पर मकान के ऊपर एक शिलापट्ट था जिस पर अंकित था गांधी अपने जीवन के अंतिम 144 दिन...

हरिजन सेवक संघ

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  पिछले साल प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा से पहले नासिक के कालाराम मंदिर का दर्शन किया।कालाराम मंदिर कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है,एक भगवान राम ने माता सीता व लक्ष्मण के साथ अपने 14 वर्ष के वनवास के शुरुआती दिन इसी दण्डकारण्य क्षेत्र में बिताए,जो पंचवटी के नाम से विख्यात है और गोदावरी नदी के किनारे है।वहीं दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना 1930 की है जिसमें अम्बेडकर व मराठी शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्ता सदाशिव साने जो साने गुरुजी के नाम से जाने जाते है।दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया।प्रदर्शनकारियों को विरोध का सामना करना पड़ा और जब उन्होंने रामनवमी के जुलूस को  मंदिर परिसर में प्रवेश करने से रोकने का प्रयास किया तो पत्थरबाजी की घटना हुई,बाद में अम्बेडकर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया।वहीं नासिक से तीन सौ किमी दूर महात्मा गांधी ऐतिहासिक दांडी यात्रा की शुरुआत कर रहें थे।जिसकी अंग्रेजी समाचार ने यह कहते हुए खिल्ली उड़ाई कि "क्या सम्राट को एक केतली के पानी उबालने से हराया जा सकता है?"जिसके जवाब में गांधी जी ने कहा कि गांधी "महोदय समुद्री जल को तब तक उबा...

दिल्ली दरबार

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साल 1876 का था,भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन (1876- 1880)थे।जो एक विख्यात कवि,उपन्यासकार व निबंध लेखक थे जिन्हें साहित्य जगत में ओवनमैरिडिथ  (OwenMeredith) के नाम से जाना जाता था।इन्हीं के शासन में एक भीषण अकाल आया था जिससे मद्रास,बंबई ,मैसूर ,हैदराबाद ,मध्यभारत के कुछ भाग व पंजाब प्रभावित हुए थे।इसी के बाद 1880 में लॉर्ड स्ट्रैची के नेतृत्व में एक अकाल आयोग का गठन किया गया था।जिससे अकाल के दिनों में दी जाने वाली सहायता पर विचार हो सके।वहीं साल1876 में ' प्रिंस ऑफ वेल्स 'दिल्ली पहुंचे और उसी साल शाही सभाआयोजित होनी थी जिसमें विक्टोरिया को भारत की शाही साम्राज्ञी की उपाधि दी जाने की घोषणा थी।प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता भी लिखी है -                    आओ आओ हे जुवराज।          धन-धन भाग हमारे जागे पूरेसब मन-काज॥       कहँ हम कहँ तुम कहँ यह दिन कहँ यह सुभ संजोग।       कहँ हतभाग भूमि भारत की कहँ तुम-से नृप लोगा॥ इसी समय लॉर्ड लिटन की दिल्ली में स...

मदन काशी

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  सोपान जोशी की हाल ही में आई किताब मैग्नीफेरा इंडिका आमों के विविध किस्म व उनके इतिहास की पड़ताल है।इसी पुस्तक के ऊपर बातचीत करते हुए एक साक्षात्कार में उन्होंने अमराई व बगीचों के अंतर को भी स्पष्ट किया है।साथ ही साथ अमराइयों के मध्य लड़ाइयों का भी जिक्र किया।इसी अमराई से मुझे एक निबंध की स्मृति मानस पटल पर अवतरित हो गई जिसका नाम है मदन काशी जिसे शिवप्रसाद सिंह ने लिखा है। यों तो मुझे दो काशी के बारे में जानकारी थी ,एक बनारस वाली काशी व दूसरी उसकी सीमा से लगती लहुरी काशी ,पर तीसरी काशी से मैं अनभिज्ञ था।जबकि मेरा निवास स्थान इसी पवित्र रमणीय स्थल में है।उसके इस महात्म्य के विषय में कुछ कहानियां सुनी थी,पर इससे अधिक जानकारी मेरे हिस्से कभी आई नहीं।ये निबंध उस कच्ची जानकारी को पूर्ण करता है...... कथा है कि श्रवणकुमार अपने मां -बाप की बहंगी उठाए सकल तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे,तब वह जमानियां पहुंचे।उन्होंने कस्बे के पास घनी अमराई देखकर बहंगी उतार दी।यहां की शीतल छाया में उन्होंने आराम किया ।उसके बाद श्रावणकुमार की बुद्धी पथभ्रष्ट हो गई। उन्होंने कहा कि बूढ़ा- बूढ़ी आप लोग के ताबूत को...