आपातकाल के 50 वर्ष

 लोकतंत्र प्रयोगशाला बन गया था जिसका प्रयोग संजय गांधी कर रहे थे ,जिसमें उनकी सहायक सारा की नानी रुखसाना सुल्तान थी।प्रयोग था नसबंदी का जिसे एक नारे में ऐसे व्यक्त किया गया "जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में. द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मर्द गया नसबंदी में।"दूसरी तरफ इंदिरा जी के लिए नारा लगता आधी रोटी खाएंगे , इन्दिरा जी को लाएंगे। इन्दिरा जी आ गई और उधर राजनरायन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैसला राजनरायन के पक्ष में।उस समय जज क्रांतिकारी हुआ करते उनके घर से जले नोट नहीं निकलते बल्कि फैसले से सियासी समीकरण बदल जाता। इन्दिरा जी ने अपने फैसले से लोकतंत्र को किया जिसे विनोबा भावे ने अनुशासन पर्व कहा वहीं दश द्वार से सोपान तक में हरिवंश राय बच्चन ने इसका समर्थन भी किया।लेकिन नागार्जुन ने बखियाँ उधेड़ दी .....

इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको 

सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को  

और जेपी के नारे संपूर्ण क्रांति ने इस अंधकार काल को उजाले से पाट दिया।

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