गुरुग्राम

 निर्मल वर्मा के उपन्यासों में कुछ शब्द बारम्बार सामने प्रकट होते हैं जिसमें पीला आलोक एक प्रमुख शब्द है।इस पीले आलोक की अपनी व्याख्या हो सकती है लेकिन गुरुग्राम से समयपुर बादली के बीच येलो लाइन पर चलने वाली मेट्रोसे गुरुग्राम के आलोक को टटोला जा सकता है...GTB से साकेत तक मेट्रो भूमिगत ही चलती है।उसके बाद वो किसी पनडुब्बी की तरह कुतुबमीनार के पास ऊपर प्रकट होती है, जहां से सुदूर सूरज का पीला आलोक मेट्रो के साथ साथ आगे बढ़ता है,कभी उसके ऊपर विमान आ जाता है तो दृश्य और सुन्दर हो उठता है।इसके इतर कुतुब मीनार से ऊंचे घर ,घरों पर सफेद पानी की टंकी और इधर मेट्रो के भीतर ऑफिस से लौटते कार्पोरेट,प्रेमी युगल,रेडिफ पर न्यूज पढ़ते अंकल ,फोन पर लूडो खेलते पति पत्नी और दूर किसी रेड लाइट पर खड़ी कारों का हुजूम जिसमें लाल रंग में चमकती उनकी बैक लाइट जो ऊपर से और आभा में निखरी नज़र आती।इन्हीं रेड लाइटों पर भीख मांगते बच्चें और बंद शीशों को खुलवाते हिजड़े भी दिखाई देते हैं.....

पर इन सबके बीच कुतुब मीनार से छतरपुर , सुल्तानपुर, घिटोरनी,अर्जनगढ़ और गुरु द्रोणाचार्य तक खूब सारे पेड़ भी दिखाई देते हैं।इसके आगे सिकंदरपुर से मिलेनियम सिटी सेंटर तक सिर्फ DLF और गगनचुंबी इमारतें दिखाई देती है।पर मेरा ध्यान टिका है गुरु द्रोणाचार्य मेट्रो स्टेशन के नाम पर ,इस क्षेत्र में उनकी भूमिका क्या रही है?इसी से गुरुग्राम का इतिहास भी खुलता है।ऐसा माना जाता है कि महाभारत के समय युधिष्ठिर ने यह क्षेत्र अपने गुरु को गुरु दक्षिणा में दिया था।यही वह क्षेत्र है जहां गुरु द्रोण ने एकलव्य का अंगूठा मांगा था।इसके बाद मौर्य ,पहलव ,कुषाण, गुप्त हर्ष ,प्रतिहार ,तोमर व चौहानों का राज रहा।बाद में चौहानों का स्थान दिल्ली सल्तनत के ऐबक ने ग्रहण किया।बलबन के समय मेवों का आक्रमण व उनका कत्लेआम भी हुआ।इसी से जुड़ा क्षेत्र नूह है जो 31 जुलाई 2023 को दंगों की वजह से सुर्खियों में आया और उसके बाद मेव कौन थे? उनके इतिहास को भी ट्रेस किया गया।दरअसल मेव हरियाणा के नूह,पलवल,फरीदाबाद व गुरुग्राम वहीं राजस्थान के भरतपुर व अलवर में व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से जिसमें मथुरा तक फैले हुए हैं।मेवों को दिल्ली के शासकों द्वारा सरदार नियुक्त किया जाता था।राजा नाहर खान, जो एक मेव थे को 1372 में दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक द्वारा 'वली-ए-मेवात' नियुक्त किया गया था। राजा हसन खान मेवाती एक और उदाहरण है। वे मेवात के अंतिम सरदार थे और 1527 की खानवा की लड़ाई में राजपूत राजा राणा सांगा की ओर से बाबर के खिलाफ युद्ध में लड़ाई लड़ी जिसमें उनकी पराजय भी हुई।अकबर के समय यह क्षेत्र सूबा हुआ करता था जो कुछ ऐसा था.......

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