हरिजन सेवक संघ

 पिछले साल प्रधानमंत्री ने राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा से पहले नासिक के कालाराम मंदिर का दर्शन किया।कालाराम मंदिर कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है,एक भगवान राम ने माता सीता व लक्ष्मण के साथ अपने 14 वर्ष के वनवास के शुरुआती दिन इसी दण्डकारण्य क्षेत्र में बिताए,जो पंचवटी के नाम से विख्यात है और गोदावरी नदी के किनारे है।वहीं दूसरी महत्त्वपूर्ण घटना 1930 की है जिसमें अम्बेडकर व मराठी शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्ता सदाशिव साने जो साने गुरुजी के नाम से जाने जाते है।दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया।प्रदर्शनकारियों को विरोध का सामना करना पड़ा और जब उन्होंने रामनवमी के जुलूस को  मंदिर परिसर में प्रवेश करने से रोकने का प्रयास किया तो पत्थरबाजी की घटना हुई,बाद में अम्बेडकर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया।वहीं नासिक से तीन सौ किमी दूर महात्मा गांधी ऐतिहासिक दांडी यात्रा की शुरुआत कर रहें थे।जिसकी अंग्रेजी समाचार ने यह कहते हुए खिल्ली उड़ाई कि "क्या सम्राट को एक केतली के पानी उबालने से हराया जा सकता है?"जिसके जवाब में गांधी जी ने कहा कि गांधी"महोदय समुद्री जल को तब तक उबाल सकते है जब तक कि डोमिनियन स्टेट्स नहीं मिल जाता।"लेकिन यहआंदोलन असहयोग आंदोलन से कई मायनों में भिन्न था।इस आंदोलन में जहां पूर्ण स्वतंत्रता को अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया,जबकि असहयोग आंदोलन का लक्ष्य स्वराज्य था।गांधी जी को इस आंदोलन में गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया था ,उन्हें बाद में 26 जनवरी ,1931 को जेल से रिहा किया गया।इसके बाद तेजबहादुर सप्रू व जयकर के प्रयासों से गांधी और इरविन के बीच 5मार्च 1931 को दिल्ली समझौता हुआ,इस समझौते को दिल्ली समझौते के नाम से भी जाना जाता है।जिसमें तय हुआ कि कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर देगी और गांधी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे।इससे पहले 12नवंबर 1930 से 13जनवरी 1931 तक लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित हुआ था।दूसरे गोलमेज सम्मेलन में जाने से पहले गांधी कराची अधिवेशन 1931 में भाग लेने के लिए कराची पहुंचे जहां उनके विरुद्ध प्रदर्शन हुए और उन्हें काले झंडे दिखाए गए।क्योंकि गांधी इरविन समझौते में भगत सिंह ,सुखदेव व राजगुरु की रिहाई के बारे में कुछ भी कह नहीं गया।23 मार्च ,1931 को भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरु को फांसी दी गई।इसे लेकर गांधी की भूमिका की हमेशा आलोचना होती रही है।वहीं दूसरी तरफ गांधी ने कराची अधिवेशन में कहा कि "गांधी मर सकते हैं लेकिन गांधीवाद सदा जीवित रहेगा।"इसके बादलंदन में दूसरा गोलमेज सम्मेलन(7 सितंबर 1931-1 दिसंबर1931)शुरू हुआ जिसमें गांधी ने भाग लिया।इसी सम्मेलन में चर्चिल ने गांधी जी को 'देशद्रोही फकीर' कहा व ब्रिटिश सरकार की गांधी को अपने बराबर का दर्जा देने की आलोचना की।इसी सम्मेलन में अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर गतिरोध उत्पन्न हुआ ।मुसलमानों,ईसाइयों ,आंग्ल भारतीयों एवं दलितों ने पृथक प्रतिनिधित्व की मांग प्रारंभ कर दी।गांधी ने साम्प्रदायिक आधार पर किसी प्रस्ताव को ठुकरा दिया।आखिरी में यह सम्मेलन सांप्रदायिक गतिरोध के कारण समाप्त हुआ।आगे चलकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को कम्युनल अवार्ड जारी किया जिसमें विभिन्न संप्रदायों को प्रतिनिधित्व दिया गया।गांधी जी ने दलित वर्ग को पृथक निर्वाचन मण्डल दिए जाने के विरोध में यरवदा जेल में 20 सितंबर ,1932 को अपना पहला आमरण अनशन शुरू कर  दिया,अम्बेडकर ने इसे राजनीतिक धूर्तता कहा।इस घटना के उपरांत डॉ राजेंद्र प्रसाद,मदन मोहन मालवीय , पुरुषोत्तम दास,सी राजगोपालचारी आदि के प्रयासों से 26 सितंबर 1932 को गांधी जी व आंबेडकर के बीच पूना समझौता हुआ।जिसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचन व्यस्था समाप्त कर दो गई तथा विभिन्न प्रांतीय मंडलों में दलित वर्ग के लिए 148 सीटेंआरक्षित की गई जबकि सांप्रदायिक पंचाट में इनको 71 सीटें मिली थी.....

इस समझौते के बाद गांधी जी ने अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग का गठन किया जिसका बाद में नाम बदलकर हरिजन सेवक संघ कर दिया गया ,जिसमें घनश्याम दास बिड़ला इसके प्रथम अध्यक्ष एवं अमृत लाल ठक्कर इसके सचिव थे।घनश्याम दास बिड़ला द्वारा लिखी गांधी जी की छत्र में छाया में भी हरिजन को लेकर बिड़ला व गांधी जी ने एक दूसरे को पत्र लिखे :
गांधी जी यरवदा जेल में ही हरिजनों के काम मे लग गये थे। इस समय हम लोग 'अखिल भारत हरिजन सेवक संघ' की स्थापना कर रहे थे। मैं उसका अध्यक्ष बना और इस हैसियत से मैंने डॉक्टर विधानचंद्र राय को संघ की बंगाल - शाखा का अध्यक्ष बनने को कहा। डाक्टर विधानचंद्र राय, जो कि इस समय पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री है, इस पद के लिए मुझे बहुत ही उपयुक्त मालूम हुए, क्योंकि वह हरिजनों के उद्धार के प्रबल समर्थक तो थे ही, साथ ही गांधीजी के पक्के अनुयायी और उनके सलाहकार - चिकित्सक भी थे । कुछ लोगों की राय थी कि डॉक्टर राय राजनीति में भाग लेते है, इसलिए उन्हें संघ का अध्यक्ष चुनने से इस विशुद्ध सामाजिक और मानवीय आन्दोलन मे अवांछनीय राजनीतिक पुट आ जायेगा । गांधीजी ने पहले तो डॉक्टर राय अध्यक्ष चुने जाने का समर्थन किया, पर बाद में आलोचकों की टीका-टिप्पणी सुनकर अपना विचार बदल दिया और डॉक्टर राय को एक पत्र लिखकर उनसे अध्यक्ष पद से हट जाने को कहा डॉक्टर राय ने जो उत्तर दिया, उसमें क्रोध की मात्रा कम, क्षोभ की अधिक थी, और उनके विरोध का ढंग भी इतना मर्यादा-पूर्ण था कि उससे गांधीजी के विचारों में फौरन परिवर्तन आ गया । उन्होने जो कुछ लिखा था, उसे उन्होंने बिना किसी शर्त के वापस ले लिया और डॉक्टर राय से अपने पद पर बने रहने का अनुरोध किया । आज शायद इस सारी घटना का कोई बड़ा महत्व नही है, फिरभी इसका उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि इससे न केवल गांधी जी की भावुकता का ही, अपितु उनके उदार स्वभाव का भी एक दृष्टांत मिलता है, और यह भी पता चलता है कि हम सब किस प्रकार उनके प्रेम की डोर मे बंधे हुए थे। मित्रों की बाते सुनते समय जहां वह सहृदयतापूर्ण भावुकता व्यक्त किया करते थे, वहां बड़ी समस्याओं और सिद्धान्तों की बात आने पर अपनी इस्पात जैसी न झुकनेवाली आत्मशक्ति का भी परिचय देते थे।नवम्बर महीने के अन्त में‌ जेल से लिखे गए गांधीजी के पत्र से प्रकट होगा कि हमारी संस्था का नाम उन्होने ही चुना था।
यरवदा मन्दिर
28-11-32


भाई घनश्याम दास
शिंदेजी की बड़ी शिकायत है कि हमने उनकी संस्था का नाम चुरा लिया। यह शिकायत ठीक मालूम होती है। हमको काम के साथ काम है, नाम के साथ नहीं, इसलिये मेरी सूचना है कि हम अखिल भारत हरिजन- सेवा संघ नाम रखें और अंग्रेजी और देशी भाषा मे यही नाम रखें। तुम आ तो रहे हो लेकिन शायद यह तुम्हे वक्त पर मिल जायगा ।
बापू के आशीर्वाद

आज भी आप गुरुतेग बहादुर मेट्रो स्टेशन से बाहर निकल किंग्सवे कैम्प की सड़क पर आगे बढ़ेंगे तो सड़क के दाहिनी ओर हरिजन सेवक संघ का बोर्ड दिख जायेगा।अंदर दाखिल होने पर सूरजमुखी के फूल जैसे छोटे -छोटे घर दिखेंगे जिसके ऊपर सर्वोदय कुटी लिखा है लेकिन उसमें भारतीय डाक खुला है।सामने विनोभा भावे की चिर परिचित श्याम मूर्ति है।ठीक उसके बाईं ओर लाइब्रेरी जहां आईएस के एस्पिरेंट अध्ययन रत हैं।इस लाइब्रेरी में हरिजन सेवक संघ से जुड़ी कोई महत्त्वपूर्ण जानकारी नहीं हैं। लाइब्रेरी के दाई ओर इसके पहले सचिव रहे ठक्कर बापा की मूर्ति है।उससे आगे बढ़ने पर बा रसोई,प्राकृतिक चिकित्सा व कस्तूरबा संग्रहालय जो बन्द पड़ा है,इसके नीचे एक शिलापट्ट अंकित है जिस पर लिखा है 1930 से 1940 तक कस्तूरबा यहीं रहती थीं और इसका उद्घाटन प्रणब मुखर्जी के द्वारा हुआ है।वहां से आगे बढ़ने पर एक धर्म स्तंभ है जिस पर उपनिषद ,गीता , महावीर वाणी , बुद्ध वाणी व गांधी सुबवचन अंकित हैं।उसके सामने गांधी जी की मूर्ति है जिसका उद्घाटन भारत के उपराष्ट्रपति आर वेकेंट रमण के कर कमलों द्वारा हुआ है।पर इन सबके मध्य मेरा ध्यान यहां की शांति और स्वच्छ परिसर पर है जिसकी गांधी आजीवन वकालत करते रहे।यहां से बाहर निकलने पर वही भीड़ व शोर में सब कुछ पीछे छूट जाता है जैसे समय के साथ हरिजन सेवक संघ का मुख्यालय छूट गया है।
वहीं श्री रामनाथ सुमन द्वारा लिखी गांधी जी उत्तर प्रदेश में लिखते है कि गांधी जी जब हरिजन सेवक संघ की यात्रा पर बनारस पहुंचे थे,वहां काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति राधाकृष्णन से मिलने के बाद कुछ यूं संदेश दिया :
1अगस्त को हिन्दू विश्वविद्यालय की सभा में भाषण करते हुए गाँधीजी ने कहा- "हिन्दू विश्वविद्यालय मेरे लिए कोई नयी वस्तु नहीं है । जब से यह आरम्भ हुआ, तभी से मालवीयजी महाराज ने मेरा सम्बन्ध उससे बाँध दिया है और आज तक वैसा ही बना हुआ है। मुझे आशा है कि विद्यार्थी लोग विद्या प्राप्त करके उसका सद्व्यय करेंगे और संकुचित अर्थ में धर्म को ग्रहण नहीं करेंगे ।" इसके बाद आचार्य ध्रुव के अनुरोध पर गीता द्वारा अपने जीवन पर पड़े प्रभावों का उन्होंने उल्लेख किया ।

किंग्सवे कैम्प सड़क पर

हरिजन सेवक पेपर
इंटरनेट आर्काइव्स

भीतर क्या क्या है 

कस्तूरबा जहां 1930 से 1940 तक रही वो आवास
जो अब संग्रहालय में तब्दील है 

पहले सचिव ठक्कर बापा
प्रणब मुखर्जी का शिलापट्ट

पीछे धर्म स्तंभ
सामने गांधी
सभी फोटो निकेश भाई के द्वारा खींची गई है जो इस पूरी यात्रा में महत्त्वपूर्ण जानकारी को रेखांकित करते रहे।




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