मुंडेश्वरी धाम :संस्मरण
कमरे का दरवाजा खोलते ही अंधकार बाहर हो जाता है ;सामने आकाश से तारे गायब हैं सिर्फ चाँद निस्तेज की अवस्था में लटका है ।सहसा मुझे लगता है सब चले गए होंगे । इस चाँद की तरह मैं भी निस्तेज हूँ जो न उठने के मोह में पड़ा हूँ ।आज विभाग की तरफ से शैक्षणिक भ्रमण यात्रा है . मुंडेश्वरी देवी के धाम जाना है ,यहीं से बिहार दर्शन भी होगा। प्रारम्भ चित्र-सिमरन देवा चंदौली की सीमा को छोड़ते ही बिहार शुरू हो जाता है ।बीच में कर्मनाशा पड़ती है जिनके ऊपर मनहूसियत का अतिरिक्त बोझ है ,स्नान करने से सारे पुण्य धुल जाते हैं पर मुझे तो कर्मनाशा से 'कर्मनाशा की हार' याद आती है ।ख़ैर बिहार जो कभी भारत का सिरमौर्य रहा है ,जिसे आज गाली की शक्ल में भी प्रयोग कर लेते हैं ।उसी बिहार में प्रवेश करते चौराहों पर क्रांतिकारी वीरों की प्रतिमा दिखती है ।सुकालू लोहार ,बाबू कृष्ण सिंह व कामरेड बुटन मास्टर का झण्डा ,एकाद और दिखी पर पोस्टरों से ढँक गयी थी ।जैसे -जैसे बिहार में दाखिल होते गए है ,उसकी विविधता दिखती गयी । सड़कें एकाद जगह टूटी मिली पर उन पर काम चल रह...