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मुंडेश्वरी धाम :संस्मरण

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 कमरे का दरवाजा खोलते ही अंधकार बाहर हो जाता है ;सामने आकाश से तारे गायब हैं सिर्फ चाँद निस्तेज की अवस्था में लटका है ।सहसा मुझे लगता है सब चले गए होंगे । इस चाँद की तरह मैं भी निस्तेज हूँ जो न उठने के मोह में पड़ा हूँ ।आज विभाग की तरफ से शैक्षणिक भ्रमण यात्रा है . मुंडेश्वरी देवी के धाम जाना है ,यहीं से बिहार दर्शन भी होगा। प्रारम्भ  चित्र-सिमरन देवा       चंदौली की सीमा को छोड़ते ही बिहार शुरू हो जाता है ।बीच में कर्मनाशा पड़ती है जिनके ऊपर मनहूसियत का अतिरिक्त बोझ है ,स्नान करने से सारे पुण्य धुल जाते हैं पर मुझे तो कर्मनाशा से 'कर्मनाशा की हार' याद आती है ।ख़ैर बिहार जो कभी भारत का सिरमौर्य रहा है ,जिसे आज गाली की शक्ल में भी प्रयोग कर लेते हैं ।उसी बिहार में प्रवेश करते चौराहों पर क्रांतिकारी वीरों  की प्रतिमा दिखती है ।सुकालू लोहार ,बाबू कृष्ण सिंह व कामरेड बुटन मास्टर का झण्डा ,एकाद और दिखी पर पोस्टरों से ढँक गयी थी ।जैसे -जैसे बिहार में दाखिल होते गए है ,उसकी विविधता दिखती गयी ।        सड़कें एकाद जगह टूटी मिली पर उन पर काम चल रह...

अँधेरे को मिटाने वाली है 'चाँदपुर की चन्दा'

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एक ब्लॉग पढ़ा था' पियवा से पहिले हमार रहलु (सन्दर्भ सहित व्याख्या)' अतुल राय ।पढ़ने के अगले चार रोज़ सिर्फ हंसता रहा और आज भी हंसने -हंसाने का जिक्र हो तो उसी को पढ़ता हूँ ।ब्लॉग वहीं है पर अतुल जी स्क्रीन राइटर हो गए है, इसी क्रम में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है 'चाँदपुर की चन्दा' जिसे हमने पढ़ा और ये पोस्ट उसी का सार है ।अद्भुत किस्म का लेखन ;गाँव -मथार का जीवन्त प्रतीक है ।जितनी देर आप पढ़ेंगे लगेगा की गाँव जो आपका छूट चुका ,वहाँ फिर से पहुंचकर इस जीवन का आनंद लिया जाये । अपने भीतर के  मन्टू को उन्हीं गलियों में टटोल जाये ,तो पहली दफ़ा में इसको पढ़ जाइए ……. चाँदपुर की चन्दा-अतुल राय फाल्गुन चढ़ रहा है ,हवा सुरसुरा के बह रही है जो शीतल कम जलनशील ज्यादा लग रही है ।ये समय और हवा ही ऐसी नहीं है ;इसी के बीच बोर्ड की परीक्षा होती है ।परीक्षा से घबराहट तो जायज़ पर बोर्ड से तो न जाने क्या -क्या बड़ जाये ?हालांकि गाज़ीपुर व बलिया में कम धुक -धुकी होती है यहाँ यन्त्र का मायाजाल है जो सबकी पीड़ाओं को मुक्त कर देता है। दूर दराज के लोग यहाँ आते है पीड़ा से मुक्त होने के लिए ।इस साल भी आये है ,बं...
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  ब्राह्मण वोट बैंक से हासिल होगा लखनऊ का तख्त ___________________________________                                                                             यूपी में अगले साल चुनाव है जिसकी गर्मी अभी से बढ़ गयी है जहां एक तरफ भाजपा के संगठन के पदाधिकारी लखनऊ में बैठके कर रहें वहीं अखिलेश भी इन दिनों जिलों के दौरे पर है .इन सबके बीच नेताओं का पाला बदलना भी शुरू हो गया .कांग्रेस के फैब थ्री (जितिन प्रसाद ,सिंधिया ,पायलट)  कल पियूष गोयल की अध्यक्षता में भाजपा में शामिल हो गए जिनका नाम कभी राहुल गांधी के करीबी के तौर पर लिया जाता था . फोटो साभार -जी  न्यूज़   अब कयासों का दौर शुरू हो गया है जितिन प्रसाद के आने से किसका फायदा किसका नुकसान है या अब कांग्रेस को आत्ममंथन को जरूरत है क्योंकि दूसरी पीढ़ी के नेता अब उसके पास नहीं है .कहा तो ये भी जा रहा है की भाजपा को एक ब्राह्मण चेहरे ...

तरक्की के लिए ,बच्चों की नीति में परिवर्तन

  तीन बच्चों की नीति से जनसंख्या में क्या उछाल होगा? __________________________________ बीते सोमवार को चीन से एक बड़ी ख़बर आई .चीन ने दो बच्चे पैदा (2016)करने की जगह दम्पति तीन बच्चे पैदा कर सकेंगे .चीन की ये घोषणा उस समय आई है जब जनगणना के आकड़ों में बच्चों की जन्म दर में कमी दर्ज की गयी है .जहां 2020 में 1.2 करोड़ बच्चे पैदा हुए जबकि 2019 में 1.465 करोड़ बच्चे पैदा हुए .दो सालों के आकड़ों में 18 फीसद का अंतर है .नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स के अनुसार जन्म दर जहां 2.1 होनी चाहिए जबकि मौजूदा दर 1.3है .पिछले दस सालों में आबादी दर बढ़ने की औसत सालाना दर 0.53 फीसदी रही है .चीन में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है जबकि बच्चे पैदा होने की दर धीमी है .चीन के पड़ोसी देश भारत के पास कुल जनसंख्या का लगभग 35 प्रतिशत युवा है . बच्चों की जन्मदर में कमी कोई एकाएक नहीं आई उसकी शुरुआत 1979 में वन चाइल्ड पॉलिस से शुरू होती है जब चीन देंग के शासन में आर्थिक तरक्की के लिए ढ़ेर सारे नियंत्रण कसना शुरू किया .लेकिन इसके पहले चीन में दो बड़ी घटनाएं हुई थी द ग्रेट लीप फारवर्ड (1958) व कल्चर रेवलूशन (1961) .लेकिन ये ...

ग़ालिब के किस्से

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हल्की सी धूप खिली थी ,चाँदनी चौक मेट्रों स्टेशन के उजले अंधरे से बाहर निकल आया था । स्टेशन के बाहर एक बेतरतीब भीड़ थी  ।मुग़ल काल के  किला को जाने वाली बेतरतीब भीड़ ।पर हमारी मंजिल कहीं और थी ।रफ़ी साहब ने गाया भी है  "जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमे तो गुज़रना नहीं।" गली थी कासिम जान की ,गली थी बल्लीमारन  की ।जहाँ तंग गलियों में एक हवेली है  मिर्जा नौशा की ।जहाँ किस्से गढ़े जाते थे ,मयकदे की और तंगहाली की जिसे यूँ भी समझा जा सकता है "हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा  'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मिरे आगे।" आज इन्हीं मिर्जा नौशा का यौम -ए-विलादत (जन्मदिन)है ।उनके यौम -ए- विलादत पर उनके कुछ किस्से । तस्वीर -ट्विटर से एक तरफ मुग़लिया सल्तनत अपने पतन पर खड़ी थी वहीं बर्तानिया हुकूमत का उदय हो रहा था ।1806 में ग़ालिब आगरा छोड़ दिल्ली आये की गुज़ारा बसर हो सकें ।क्योंकि 13 साल की उम्र में उनकी शादी 11 साल की 'उमराव बेगम 'से हो चुका था ।आज की भाषा में इसे 'माइग्रेशन 'कहा जा सकता है या ग़ालिब की भाषा में कहे तो   "है अब इस माअ़मूरा में, ...

इजराइल की राजनीति

  एक दशक की सत्ता एक वोट से गयी  ________________________________________ साल 1999 का था भारत कारगिल युद्ध जीत चुका था लेकिन भारतीय राजनीति में 13 दिनों तक चलने वाली सरकार गिर गयी थी. वो बहुमत के जादुई आंकड़े से 1 वोट पीछे रह गयी.इसी तरह की राजनीति इसराइल में हुई है.जहां 11 दिनों तक रॉकेटों का शोर था किंतु राजनीति शांत थी अब  इसराइल की सत्ता में एक दशक तक सत्ता पर काबिज रहें नेतन्याहू जो जादूगर या पॉलिटिकल सर्वाइवर के तौर जाने जाते थे उन्हें भी 59 के मुकाबले 60 वोट से अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी है .बीती रात नेफ्ताटली बेनेट ने अपने आठ सहयोगी गठबंधन पार्टियों की मदद से बहुमत हासिल करने के बाद इसराइल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली .      नेफ्ताटली बेनेट(यामिना पार्टी ) की खुद की पार्टी के पास भले ही 6 सांसद रहें हो लेकिन वो प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे थे क्योंकि उनके बिना बहुमत का आकड़ा किसी के पास नहीं था .वो 2023 तक प्रधानमंत्री रहेंगे इसके बाद उनके सहयोगी जो मशहूर टीवी एंकर याहिर लिपिड(सेंट्रिस्ट पार्टी ) अगले दो साल तक प्रधानमंत्...

बिहार के बहार की पड़ताल है 'रुकतापुर'

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  1865 में भी एडिसन आरनल्ड ने लिखा था:रेलवे भारत के लिए वह कार्य कर देगी जो बड़े -बड़े वंशों ने पहले कभी नहीं किया-जो अकबर अपनी दयाशीलता अथवा टीपू अपनी उग्रता द्वारा नहीं कर सके,वे भारत को एक राष्ट्र नहीं बना सके । तकरीबन दौ साल बाद पत्रकार लेखक इसी जोड़ने वाली ट्रेन से बिहार यात्रा पर निकलते है ।रेलवे ने जोड़ा तो है एक जिला मुख्यालय को जिला मुख्यालय से न जोड़कर बड़े बड़े महानगरों को ।सीधी ट्रेन पटना के लिए नहीं है लेकिन दिल्ली ,बम्बई और कोलकाता के लिए अनेकों ट्रेन है । इसी ट्रेन पर सवार होकर जनता अपनी बेकारी ,निराशा और अँधेरे में भविष्य को रेल के धुएँ की तरह पीछे छोड़कर पलायन कर रही है जिसकी ताकीद ट्रेनों के नाम भी करते हैं।श्रमजीवी एक्प्रेस ,जनसेवा एक्सप्रेस ,जनसाधारण एक्सप्रेस।कहने वाले ये भी कह सकते है"लागल झुलनिया के धाक्का बलम कलकत्ता पहुंच गये...  रुकतापुर -पुष्यमित्र लेकिन यहाँ ट्रेन मुक्तापुर में रुके चाहे न रुके रुकतापुर में जरूर रुक जाती है।बुलेट के जमाने में ट्रेन किसी भरपेट खाये हुए आदमी की तरह चलती है ।ट्रेन को जहाँ नहीं रुकना  होता है वहाँ भी चैन पुलिंग कर रोक दिया...