ग़ालिब के किस्से

हल्की सी धूप खिली थी ,चाँदनी चौक मेट्रों स्टेशन के उजले अंधरे से बाहर निकल आया था । स्टेशन के बाहर एक बेतरतीब भीड़ थी  ।मुग़ल काल के  किला को जाने वाली बेतरतीब भीड़ ।पर हमारी मंजिल कहीं और थी ।रफ़ी साहब ने गाया भी है 

"जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमे तो गुज़रना नहीं।" गली थी कासिम जान की ,गली थी बल्लीमारन  की ।जहाँ तंग गलियों में एक हवेली है  मिर्जा नौशा की ।जहाँ किस्से गढ़े जाते थे ,मयकदे की और तंगहाली की जिसे यूँ भी समझा जा सकता है

"हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा 

'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मिरे आगे।"


आज इन्हीं मिर्जा नौशा का यौम -ए-विलादत (जन्मदिन)है ।उनके यौम -ए- विलादत पर उनके कुछ किस्से ।



तस्वीर -ट्विटर से


एक तरफ मुग़लिया सल्तनत अपने पतन पर खड़ी थी वहीं बर्तानिया हुकूमत का उदय हो रहा था ।1806 में ग़ालिब आगरा छोड़ दिल्ली आये की गुज़ारा बसर हो सकें ।क्योंकि 13 साल की उम्र में उनकी शादी 11 साल की 'उमराव बेगम 'से हो चुका था ।आज की भाषा में इसे 'माइग्रेशन 'कहा जा सकता है या ग़ालिब की भाषा में कहे तो  

"है अब इस माअ़मूरा में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त  'असद'

हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या।"

ग़ालिब के यौम -ए-विलादत पर कुछ किस्से ...........

ग़ालिब और बहादुरशाह जफ़र का किस्सा

रमज़ान का महीना बीता ही था ।ग़ालिब उसके कुछ रोज़ बाद लाल किला गए । 

बहादुरशाह ज़फ़र ने पूछा : "मिर्ज़ा ,कितने रोज़े रखे?"

ग़ालिब ने परिहास किया:"बस ,हुज़ूर एक नहीं रखा।"



गिरहबन्द का किस्सा 

ग़ालिब रात को सोते समय गिरहबन्द लगा लेते ।पूछने पर पता चलता नहीं कोई दिक्कत नहीं ।रात को तबीयत शेर गोई हो जाती और शेर भूले न इसलिए वो गिरहबन्द लगाते जाते ।जब सुबह उठकर गिरह खोलें तब शेर ही निकलते ।ऐसी एक गिरह के बाद मालिकराम ने ये शेर लिखा था।

ऐ जौक़-नवा संजी ,बाजम बखरोश आवर 

गोगा -ए-शब-ए-खून -ए-बर निगाह ,होश आवर 



ग़ालिब के कटाक्ष 1857 के बाद

इस क्रांति के जीवित दस्तावेज थे ग़ालिब ,क्रांति के बाद जब अंग्रेजों ने मुग़लों से जुड़े मुसलमानों की धर पकड़ शुरू की ।उसी में ग़ालिब को भी गिरफ्तार भी कर लिया गया और उन्हें अंग्रेज अधिकारी के सम्मुख पेश किया गया ।

अंग्रेज ने पूछा :क्या तुम मुसलमान हो 

ग़ालिब :"जी ,आधा मुसलमान हूँ ।"

अंग्रेज :"क्या मतलब है तुम्हारा ?"

ग़ालिब :" शराब पीता हूँ ,सूअर का गोश्त नहीं खाता ।"



ग़ालिब और मोमिन का किस्सा 

मोमिन शतरंज के बड़े खिलाड़ी थे ।जब खेलने बैठ जाते तो उनको सुध-बुध ही नहीं रहती ।उस समय दिल्ली के बड़े शतरंजबाज 'करामत अली 'से इनका खूब मुकाबला होता ।पर मोमिन एक बड़े शायर भी थे ।वो किसी राजदरबार में नहीं गए ।कुछ वक़्त टोंक के महाराज के यहाँ रहें ।उन्हीं के एक शेर "तुम मेरे पास होते हो गोया 

जब कोई दूसरा नहीं होता ।" 

इसी शेर को सुनकर ग़ालिब अपना पूरा दीवान रखने की बात की ।

लेकिन इतना जिंदादिल ,हास की कला जानने के बाद ग़ालिब के ऊपर भी ग़म का पहाड़ था ।दाम्पत्य जीवन में हताशा थी क्योंकि ग़ालिब के कुल 7 पुत्रों की जो ख़ुशी की इंतिहा होती वो हर बार ग़म में बदल गयी ।ग़ालिब ने फ़रमाया

"कोई उम्मीद बर नहीं आती 

कोई सूरत नज़र नहीं आती 

क्यूँ न चीखूँ कि याद करते हैं

मेरी आवाज़ गर नहीं आती 

दाग़ -ए-दिल गर नज़र नहीं आता 

बू भी ऐ चारागर नहीं आती।"



हिन्दी -उर्दू के बहस में 

हर कोई ग़ालिब को पसन्द करता है जबकि ग़ालिब तो उर्दू में लिखते है ।संविधान से लेकर अब तक एक समानांतर रेखा खिंची है भाषा पर ।इस पर शरद जोशी यूँ कहते है "अगर हिन्दी वालों में डकैती और चोरी के ज़रा भी गुण हैं तो उन्हें चाहिए कि वे ग़ालिब को उर्दू से चुरा लायें।और अगर न चुराया जा सके तो सारी उर्दू ज़बान चुरा लायें।"



अब जब ढ़ेर सारे तथ्य और तर्क हैं तब एक अलग नैरेटिव ही चर्चा में है ।कभी कुछ बहाने कुछ और कभी -कभी सीधा अलग तरह का पाठ सामने आ रहा है ।ऐसे समय 'अटल जी' ने 1998 के ग़ालिब इंटरनेशनल  सेमिनार में क्या कुछ कहा था ,सुनना जरूरी है ।

"अहद -ए-मुग़लिया ने हिंदुस्तान को तीन चीज़ें दी हैं -ताजमहल ,उर्दू ज़बान और ग़ालिब की शायरी ।उर्दू ग़ज़ल की ख़ास बात यह है कि कम -से -कम शब्दों में ज्यादा-से-ज्यादा बात बख़ूबी बयान हो जाती है।उर्दू इस ख़ूबी की तरफ हिन्दी और दूसरी भाषाओं को ध्यान देना चाहिए ।"




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