इजराइल की राजनीति

 एक दशक की सत्ता एक वोट से गयी 

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साल 1999 का था भारत कारगिल युद्ध जीत चुका था लेकिन भारतीय राजनीति में 13 दिनों तक चलने वाली सरकार गिर गयी थी. वो बहुमत के जादुई आंकड़े से 1 वोट पीछे रह गयी.इसी तरह की राजनीति इसराइल में हुई है.जहां 11 दिनों तक रॉकेटों का शोर था किंतु राजनीति शांत थी अब  इसराइल की सत्ता में एक दशक तक सत्ता पर काबिज रहें नेतन्याहू जो जादूगर या पॉलिटिकल सर्वाइवर के तौर जाने जाते थे उन्हें भी 59 के मुकाबले 60 वोट से अपनी प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी है .बीती रात नेफ्ताटली बेनेट ने अपने आठ सहयोगी गठबंधन पार्टियों की मदद से बहुमत हासिल करने के बाद इसराइल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली . 

    नेफ्ताटली बेनेट(यामिना पार्टी ) की खुद की पार्टी के पास भले ही 6 सांसद रहें हो लेकिन वो प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे थे क्योंकि उनके बिना बहुमत का आकड़ा किसी के पास नहीं था .वो 2023 तक प्रधानमंत्री रहेंगे इसके बाद उनके सहयोगी जो मशहूर टीवी एंकर याहिर लिपिड(सेंट्रिस्ट पार्टी )

अगले दो साल तक प्रधानमंत्री रहेंगे यदि गठबंधन की सरकार आगे चलती है तो .ऐसा इसलिए कहा जा रहा क्योंकि गठबंधन में (दक्षिण पंथी ,वामपंथी ,सेक्युलर ) हैं जो सत्ता के लिए बेमोल गठजोड़ है .जिसका बड़ा कारण रहा पिछले दो सालों में चार चुनावों में किसी को स्पष्ट बहुमत का न मिलना . 

  नेतन्याहू इसके बावजूद सत्ता पर काबिज रहें इसके लिए उन्होंने अपने सबसे कड़े प्रतिद्वंद्वी 'बैनी गैटज 'को अपना सहयोगी बना लिया .भले ही प्रधानमंत्री के पद पर रहते उनके ऊपर भ्रष्टाचार ,रिश्वतखोरी और जमाखोरी के आरोप लगे .किंतु इस बार उनका जादू नहीं चला बावजूद इसके वो नेता प्रतिपक्ष रहेंगे .हालांकि नेफ्ताटली बेनेट कभी नेतन्याहू के वफादार हुआ करते थे उन्हीं के समय बेनेट 'चीफ ऑफ स्टॉफ (2006-2008 ) रहें .

    नेत्याहू भले सत्ता के बाहर हो किंतु उन्होंने हर बार वापसी की है .1996 में यित्ज़ाक राबिन की हत्या के बाद सीधे प्रधानमंत्री चुने गए वहीं 1999 में इस्तीफा दे दिया .जिसके बाद कयास लगाएगये की नेतन्याहू का दौर खत्म हो चुका लेकिन 'किंग बीबी' के नाम से प्रसिद्ध नेतन्याहू ने 2009 में सत्ता में वापसी की जिसके बाद एक दशक तक इसराइल में सिर्फ और सिर्फ नेतन्याहू का बोलबाला था .

  लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स के कॉलमिस्ट थॉमस फ्रीडमैन नेतन्याहू की सियासत को कुछ ऐसे देखते है " ट्रम्प की तरह ,चुनाव जीतने के लिए नेतन्याहू की मुख्य राजनीतिक रणनीति एक गहन व्यक्तित्व पन्थ को बढ़ावा देना और इसराइल को अधिक से अधिक लाइनों में विभाजित करके पतली बहुमत के  साथ सत्ता हासिल करने और पकड़ने की कोशिश करना  है- उनके मामले में मुख्य रूप से यहूदी बनाम अरब ,वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी ,धार्मिक बनाम धर्मनिरपेक्ष  और देशभक्त बनाम देशद्रोही ।" 

 यही नहीं नेतन्याहू का मानना था की वही सही व्यक्ति है इस छोटे राष्ट्र का नेतृत्व करने के भले ही कोरोना वायरस के प्रसार और उससे हुई मौतों को रोकने में नाकाम रहें .किन्तु जल्द ही इसराइल में जन -जीवन सामान्य हुआ क्योंकि सभी को वैक्सीन लग गयी जो उनकी जीत थी एक तरह से .

हालांकि नेतन्याहू पर ये भी आरोप लगते रहें है की सरकारी मशीनरी का उन्होंने दुरूपयोग किया यहाँ तक की मीडिया को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश की .

   वहीं कुछ लोगों का मानना भी है की नेतन्याहू युग का अंत उसी समय शुरू हो गया था जब अमेरिका में ट्रम्प राष्ट्रपति बने क्योंकि उन्होंने नेतन्याहू की उन सारी मांगों को पूरा किया जिसकी लम्बे समय से दरकार थी .यरुशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता हो या अमेरिकान दूतावास का तेल अवीव में खुलना .ईरान पर न्यूक्लियर डील कसना और इसराइल पर नरम रुख रखना आदि .

  बनिस्पत इसके नेत्याहू ने इसराइल को आर्थिक क्षेत्र में अग्रसर किया और यही नहीं अलग -२ समय पर डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के साथ ऐतिहासिक समझौते किये जैसे यरुशलम में अमेरिकी दूतावास का खुलना .


नेतन्याहू भले ही प्रधानमंत्री न हो लेकिन नेता प्रतिपक्ष के रूप में नई सरकार के लिए चुनौती होंगे . वहीं नेफ्ताटली बेनेट जो एक अमीर कारोबारी है और 2019 में ये पहला मौका था कि वो किसी सरकार में मंत्री नहीं बने लेकिन 11 महीने बाद सीधे प्रधानमंत्री बन गए .बेनेट  को नेत्याहू से भी ज्यादा कट्टपंथी माना जाता है वह यहूदी राष्ट्र की न सिर्फ बात करते हैं बल्कि 60% क्षेत्र पर यहूदियों को बसाने की भी बात करते है .हाँ गाजा पर उनका कोई दावा नहीं है .इतना ही नहीं वह पूर्वी यरुशलम और गोलन हाइट्स को भी यहूदी इतिहास का हिस्सा मानते है .

   यही नहीं एक इंटरव्यू में बेनेट ने कहा की "जब तक मैं सत्ता में हूँ तब तक एक सेंटीमीटर भी जमीन नहीं मिलेगी ."इतना ही नहीं वह फिलस्तनियों के ख़िलाफ़ सख्ती से कदम उठाने की बात करते है और मौत की सजा को जायज ठहराते है.उनसे एक इंटरव्यू में जब सम्पत्ति से जुड़ा सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा "न मैं 17 स्टिक्स खाता हूँ न ही प्राइवेट प्लेन है बस मेरी इतनी हैसियत है कि जो करना चाहता हूँ वो कर लेता हूँ ।"

 ये देखना रोचक होगा की बेनेट का कार्यकाल इसराइल को किस मोड़ पर खड़ा करता है क्या वो गठबंधन के बीच अपने हैसियत भरे फैसले ले पाते है या नहीं ?

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