अँधेरे को मिटाने वाली है 'चाँदपुर की चन्दा'
एक ब्लॉग पढ़ा था' पियवा से पहिले हमार रहलु (सन्दर्भ सहित व्याख्या)' अतुल राय ।पढ़ने के अगले चार रोज़ सिर्फ हंसता रहा और आज भी हंसने -हंसाने का जिक्र हो तो उसी को पढ़ता हूँ ।ब्लॉग वहीं है पर अतुल जी स्क्रीन राइटर हो गए है, इसी क्रम में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है 'चाँदपुर की चन्दा' जिसे हमने पढ़ा और ये पोस्ट उसी का सार है ।अद्भुत किस्म का लेखन ;गाँव -मथार का जीवन्त प्रतीक है ।जितनी देर आप पढ़ेंगे लगेगा की गाँव जो आपका छूट चुका ,वहाँ फिर से पहुंचकर इस जीवन का आनंद लिया जाये । अपने भीतर के मन्टू को उन्हीं गलियों में टटोल जाये ,तो पहली दफ़ा में इसको पढ़ जाइए …….
फाल्गुन चढ़ रहा है ,हवा सुरसुरा के बह रही है जो शीतल कम जलनशील ज्यादा लग रही है ।ये समय और हवा ही ऐसी नहीं है ;इसी के बीच बोर्ड की परीक्षा होती है ।परीक्षा से घबराहट तो जायज़ पर बोर्ड से तो न जाने क्या -क्या बड़ जाये ?हालांकि गाज़ीपुर व बलिया में कम धुक -धुकी होती है
यहाँ यन्त्र का मायाजाल है जो सबकी पीड़ाओं को मुक्त कर देता है। दूर दराज के लोग यहाँ आते है पीड़ा से मुक्त होने के लिए ।इस साल भी आये है ,बंगाल से उनकी पीड़ा हैं वो चार बार से बोर्ड न पास हो पाये है।भविष्य के सूरज के ऊपर बादलों का साया है ,जो पास होने के बाद तत्काल हट सकता है ।वो व्यवस्था बलिया के 'फुलेसरी देवी मेमोरियल इंटर कॉलेज ,चाँदपुर में है ;विद्वान उसे सुविधा शुल्क भी कह सकते हैं। हाँ इससे शिक्षा व्यवस्था का एक नया उद्योग भी कह सकते हैं ;जहाँ से आप बच्चों को पास करा व भरपूर सुविधा शुल्क वसूल कर कल को उसे परधानी ,जिला पंचायत में वोट खरीदने ,दारु बांटने के लिए व नवछिटुवों लचक कमर वाली फजलुआ बैण्ड पार्टी शो के ऊपर उड़ा सकते हैं।
फाल्गुन की हवा चढ़ी है तो नायक पर प्रेम का रंग न चढ़े
ऐसा हो सकता है? कवि जन भी गा गए है "पछुआ टोला में एगो सुनरकी रहल,उहे जवन गोरकी पतरकी रहल ।"
नायिका के इस मनोहारी छंटा पर सिर्फ नायक ही नहीं हारा है बल्कि बगल की भौजाई भी हारी है।कभी चिट्ठी के बहाने कभी कड़ाई -सिलाई के बहाने नायिका को बुला लेती है ,उनकी इसी बहाने हंसी ठिठोली हो जाती है क्योंकि उनका नायक तो सीमा पर है ।पर नायक पर प्रेम का बुखार चढ़ है; नायक नायिका की याद में कैसेट पर कैसेट सुन रहा है पर भेंट हों नहीं रही है ।सिर्फ पत्राचार चल रहा है ।इधर नायक की बहन की शादी ठीक हो गयी है ,मौका भी आन पड़ा है दो प्रेमी दिलों के मिलने का क्योंकि नायिका न सिर्फ पढ़ने-लिखने में अव्वल है बल्कि कविता ,कड़ाई-सिलाई में गुणी भी है।इसके अलावा एक विशेष गुण भी आधुनिक सौंदर्य प्रसाधन से सांवले मुखड़े को चमका देने का।नायक भी चाहता है कि उसका भी प्रसाधन से चेहरा चमचमा उठे क्योंकि नायक को कैसेट व फूकन की दूकान पर बैठकी से फुर्सत ही नहीं है।
पर नायक को कहाँ पता की उसका भी मेकअप होने की तैयारी चल रही है क्योंकि अगला महीना जेठ का है ।जिसमें परधानी का चुनाव है ,सुविधा शुल्क वाले डब्ल्यू जी प्रत्याशी है ।चुनाव से पहले माहौल न बनें तो मतदाता प्रत्याशी को कमजोर आंकने लगे ,इस डर से या वोट का समीकरण न बिगड़ जाए इसलिए भी प्रत्याशी नायक के बहन की शादी में नाच के बहाने सिर -फुटव्वल करा देता है ।ताकी गाँव का एक पक्ष उसकी ओर जरूर रहें ।जिससे वोट का गणित भी मजबूत हो और कमजोर प्रत्याशी भी न आंका जाए ।समावेशी राजनीति बनी रहें ।
चुनाव में प्रत्याशी जीत जाता है पर दियर की किस्मत इससे जागेगी? क्योंकि पिछ्ला परधान चुनाव जीतकर व स्कार्पियों खरीद शहर में बस गया ।दियर में हर साल बाढ़ आती है ,टीएस बाँध पर सामुदायिक शिविर केंद्र बन जाता है।परधान व विधायक को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ,उनकी विकास की धारा बह रही है भले ही आप के आपके बच्चों का भविष्य दियर के जल में समा जाये ।उसे बस इतना फर्क पड़ता है कि अख़बार के मुख्य पृष्ठ पर राहत सामाग्री वितरण करते फ़ोटो छप जाये ।इस अतिरिक्त प्रयास के लिए पत्रकार को पांच सौ पकड़ा भी दिया जाता है।
पर लोगों का मोह अपने गाँव के प्रति कैसे छूट जाए ,बाढ़ एक उपजाऊ मिट्टी भी लेकर आती है जिससे जीवन फिर पुनर्नवा हो उठता है ।
इस पुनर्नवा जीवन में लोक फिर से रचता व बसता है ;रामलीला की तैयारी होती है।पिछले झगड़े भुला दिए जाते है ।नायक का निर्वासन भी कट जाता है ,जिससे नायिका से मिलने की हूंक भी जागती है क्योंकि बाढ़ में अंजोरिया रात में मिलते उन्हें किसी ने देखा लिया था ।तब से अलग बहस चल रही है ।रामलीला के मुख्य स्क्रिप्ट बाढ़ में बह गयी है ,कपड़े भी नहीं है न चिंगारी जी है क्योंकि उनकी प्रेमिका का पति बीएड कर मास्टर हो गया है ।चिंगारी जी इस वक्त सिर्फ यही कह रहें है
इश्क की पढ़ाई तो ए टू जेड किया
हाय!हमने क्यों नहीं बीएड किया ।"
इधर नायिका अपनी चाची से की मधुर गारियां (बुजरो ,हरजाई
मुंह झौंसी) सुनकर ,एक नये भविष्य की ओर उन्मुख होती है ।जहाँ चिंटूवा टाइप आवारा लड़के पुल पर बैठकर उसके राह में कांटे बोते है व फब्तियां कसते है "का जी,मंटुआ नहीं दिख रहा है ,अब तो हमको दे दो ।ऊपर से ही दे दो ।"
इन चिंटूवा टाइप लोगों के भय से उसे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आज वो रुक गई तो कल दूसरी पिंकी इस दहलीज को पार नहीं कर पायेगी ।सबके जीवन में अन्धेरा होता है पर कोई उजाला देने भी आता है ;पिंकी के जीवन में झांझा बाबा आते है उसका जीवन अन्धकार से प्रकाश की ओर बढ़ चलता है ।झांझा बाबा एक बड़ा फैसला लेते है जिसे क्रन्तिकारी या रूढ़ि को तोड़ने वाला भी कहा जा सकता है ।पिंकी को न सिर्फ अपनी बेटी बनाते है बल्कि अपना घर -दुआर सब उसके नाम कर देते है ।भले ही उनके तीन बेटे हों ।जिनके लिए गाँव व दियर उतना ही नीचा हो गया है जितना उनका फ़्लैट ऊंचा हो गया ।बाबा पिंकी को सामुदायिक विवाह की भठजोग से निकाल ,उसकी मर्जी से उसके मन्टू से कराते है।एक नई चेतना फूंका है बाबा ने व पिंकी बाबा के भरोसे पर खरी उतरी है ।उसका इरादा नेक है सिर्फ अपने लिए नहीं ।अपने जैसी हजारों पिंकी को उसे मुक्त कराना है ,इस सामुदायिक विवाह व पढ़ाई रोक देने वाले पिताओं से …..
वीडियो -अतुल भैया के ट्विटर से
दियर के उस बीच में चाँद निकल आया
पिंकी गम्भीर हो गई ,"अभी कहाँ पार हुए हैं बबुआ ?अभी तो चाँदपुर की कई चंदाएं उस पार खड़ी हैं।अभी तो कई गुड़िया और पूनम की आँखों को हमारा इन्तजार है।अभी तो कई सविता और लीला को सशक्त बनाकर उनकी आँखों में नये सपने बोने हैं, उनको मंजिल दिखानी है ।अभी तो हमने आधी लड़ाई जीती है, आधी बाकी है।"
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