तरक्की के लिए ,बच्चों की नीति में परिवर्तन
तीन बच्चों की नीति से जनसंख्या में क्या उछाल होगा?
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बीते सोमवार को चीन से एक बड़ी ख़बर आई .चीन ने दो बच्चे पैदा (2016)करने की जगह दम्पति तीन बच्चे पैदा कर सकेंगे .चीन की ये घोषणा उस समय आई है जब जनगणना के आकड़ों में बच्चों की जन्म दर में कमी दर्ज की गयी है .जहां 2020 में 1.2 करोड़ बच्चे पैदा हुए जबकि 2019 में 1.465 करोड़ बच्चे पैदा हुए .दो सालों के आकड़ों में 18 फीसद का अंतर है .नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स के अनुसार जन्म दर जहां 2.1 होनी चाहिए जबकि मौजूदा दर 1.3है .पिछले दस सालों में आबादी दर बढ़ने की औसत सालाना दर 0.53 फीसदी रही है .चीन में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है जबकि बच्चे पैदा होने की दर धीमी है .चीन के पड़ोसी देश भारत के पास कुल जनसंख्या का लगभग 35 प्रतिशत युवा है .
बच्चों की जन्मदर में कमी कोई एकाएक नहीं आई उसकी शुरुआत 1979 में वन चाइल्ड पॉलिस से शुरू होती है जब चीन देंग के शासन में आर्थिक तरक्की के लिए ढ़ेर सारे नियंत्रण कसना शुरू किया .लेकिन इसके पहले चीन में दो बड़ी घटनाएं हुई थी द ग्रेट लीप फारवर्ड (1958) व कल्चर रेवलूशन (1961) .लेकिन ये आने वाली तस्वीर का आधा रूप था असली तस्वीर आनी अभी बाकी थी .क्योंकि 1970 के मध्य में नारा चलता था "लेटर,लांगर और फियूर ।" साल 1979 में वन चाइल्ड पॉलीसी जोर शोर से शुरू हो गयी .
किंतु इस नई घोषणा से चीन में कोई बहुत उत्साह नहीं है क्योंकि 30 साल से अधिक जकड़ी व्यवस्था में लोग एक बच्चे के आदी हो चुके है उन्हें अब दो बच्चे या तीन बच्चे पैदा करने पर ढ़ेर सारे अंधकार दिख रहें हैं .चीन में लम्बे समय से जारी वन चाइल्ड पॉलिसी की वजह से लैंगिक असन्तुलन बढ़ गया है .बच्चे की चाह में लड़कियों की भ्रूण हत्या की गयी या अनाथालय भेज दी गयी .इसका प्रभाव यह हुआ लोगों को शादी करने में दिक्कत होने लगी .इसके अलावा दूसरे कारण भी है जिससे
चीन में वर्किंग महिलाएं अधिक बच्चे पैदा नहीं करनी चाहती क्योंकि चीन में मैटेर्निटीव लिव को लेकर कम सप्ताह का अवकाश है ज्यादा दिन होंने पर उनके रोजगार जाने का डर है .वहीं ज्यादातर महिलाएं परिवार बढ़ाने के बजाय नौकरी या आगे पढ़ना चाहती हैं .वहीं दूसरी तरफ चीन में महंगाई भी चरम पर है स्कूल की फ़ीस से लेकर रहने आदि तक .कामकाजी व्यक्ति को सबसे बड़ी दिक्कत है अधिक बच्चे होने पर उनकी देखभाल और अधिक समय जिससे उनका वर्क हावर बिगड़ने का डर है .इसके अलावा कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें बच्चे में कोई खास दिलचस्पी नहीं उन्हें एक भी बच्चा पैदा नहीं करना .
इसलिए चीन लोकलुभावन नीति शुरू की .चीन में जहां पुरुषों के रिटायरमेंट की उम्र 60 वहीं महिलाओं की 55 है जिसमें सुधार करने की बात कही गयी है .इतना ही नहीं मैटेर्निटीव /पैटेर्निटीव लिव में बदलाव करने की बात कही गयी है .इसके अतिरिक्त वर्क प्लेस पर भी सुधार की बात कही गयी है .फिर भी लोगों में अनिश्चितता का डर है .
यही नहीं चीन की बच्चों की नीति पर एमनेस्टी इंटरनेशनल(मानवा अधिकार संगठन ) ने सवाल खड़ा कर दिया है ,उसका कहना है कि यह पॉलीसी "यौन और प्रजनन अधिकारों का उल्लंघन है।"
चीन अपने यहाँ की जन्म दर को बढ़ाना चाहता है ढ़ेर सारे मुनादी पीटकर लेकिन वो उइगर मुस्लिमों की जन्म दर को कम करने के लिए ढ़ेर सारे नियंत्रण कसा हुआ है .
जानकारों का मानना है कि चीन की पॉलिसी बहुत देर से आई है अब इसका कोई लाभ नहीं .वहीं कुछ लोगों को लगता है कि जनसंख्या के घटते आंकड़े देखकर चीन आने वाले सालों में जनसंख्या पर से पूरी तरह नियंत्रण खत्म कर देगा .क्योंकि चीन की आबादी तेजी से बूढ़ी होती जा रही है विश्व स्वास्थ्य संघठन की रिपोर्ट के अनुसार 60 साल से ऊपर के लोगों का अनुपात 2010 में जहां 12.4 प्रतिशत था वहीं 2040 में बढ़कर ये आकड़ा 28 प्रतिशत हो जाएगा .
वहीं कुछ लोगों को लगता है कि इस फैसले का असर ज्यादा शहरों में नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में पड़ेगा क्योंकि बीजिंग और शंघाई में रहने वाली महिलाएं देर से बच्चे पैदा करने की सोचेंगी जबकि ग्रामीण पुरानी परम्पराओं की तरह बड़ा परिवार की चाह रखेंगी .
कई लोगों का ये भी मानना है कि इससे शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में असमानता भी बढ़ने का खतरा है वहीं दूसरी तरफ यदि चीन की जनसंख्या कम होती है तो इसका असर दुनिया पर भी पड़ेगा .
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