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Showing posts from December, 2022

कोटा की पहचान खुदकुशी न बनें

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" बच्चें दो साल में कोटा से निकल जाते हैं,कोटा सालों तक बच्चों से नहीं निकलता।" ये जीतू भैया का संवाद है जो बीते बरस आई वेब सीरीज कोटा फैक्ट्री का है।हाँ वही कोटा फैक्ट्री जहाँ से हजारों आई.आई.टी व मेडिकल में दाखिला पाते हैं।वहीं लाखों के सपनें किसी यूनिवर्सिटी व कॉलेज में दाखिले लेकर कोटा की  दन्तकथाओं में बदल जाते हैं।ये दन्तकथायें टीवी व सड़कों की होर्डिंग्स पर जगजगाते चेहरों की न होकर उस चैम्बर में घुटकर दम तोड़ती खुशियों की होती है जो उनके जीवन में दसवीं पास के बाद से ही शुरू हो जाता है।जो आगे चलकर इतना स्याह हो जाता है कि पीछे लौटना मुश्किल हो जाता है व अपनी परेशानी साझा करने पर कमजोर का ठप्पा लगा दिया जाता न तो फलाने के लड़ने से तुलना हो सकती है क्योंकि पिता ने भी तो यही देखकर अपने लड़के को इस चैम्बर में भेजा है या हो सकता लड़का भी जोश में आ गया हो उस चका चौंध को देखकर जिसके पीछे का स्याह अन्धेरा वो  न देख पाया हो।अभी आँखों में जब गड़ने लगा है तो उसे इसका एहसास हुआ।अब तो देर हो गयी है न क्योंकि वापस लौटना उपहास व हास्य का पात्र होना होता है और  यहाँ मित्र भी प्रतिद्वंद्व...

जुगल जोड़ी

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 बीती रात क़तर फुटबॉल विश्वकप का दुसरा सेमीफाइनल मुकाबला सम्पन्न हो गया।इसके साथ ही पहली अफ्रीकन टीम जिसने सेमीफाइनल में जगह बनाई थी,फाइनल खेलने का सफ़र उसका थम गया।फ्रांस ने मोरक्को 2-0 गोल से हराकर दूसरी बार फाइनल में जगह बनाई ,इससे पहले 2018 में वो ख़िताब अपने नाम कर चुकी है।20 साल में फ़्रांस लगातार दूसरा विश्वकप खेलने वाली पहली टीम हो गयी है।यदि वो विश्वकप जीतती है तो 60 साल के ब्राजील के उस पुराने रिकॉर्ड की बराबरी कर सकती है। फाइनल में जहाँ उसका मुकाबला अर्जेंटीना से होना है, जो 2014 के बाद दूसरी बार  फाइनल में पहुंची है........   बहरहाल,इस सेमीफाइनल में काफ़ी कुछ घटा ,मैच के चन्द मिनटों में ही मोरक्को की सुरक्षा पंक्ति को भेद फ्रांस ने गोल कर अजेय बढ़त बना ली।इसके साथ ही फ़्रांस ने अपने उस रिकार्ड को भी बरकरार रखा जब वो पहले गोल करने के बाद कभी हारी नहीं।आखिर में यही हुआ फ्रांस 2से जीता । हां बिलाशक मोरक्को ने इस विश्वकप में दिल जीता जिस तरह से उसने बढ़ी टीमों को शिकस्त देकर सेमीफाइनल में जगह बनाई,सेमीफाइनल मुकाबले में भी उसने कोशिशें की पर तकदीर ने साथ न दिया।ऐसे मुकाबले...

दीक्षांत का उत्सव

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नींद की घानी पूरी हो गयी है या देह से कम्बल किसी ने झटक अपनी देह को ओढ़ा दिया है।ऐसा ही हुआ है न!क्योंकि कमरा उन नायाब तबीयत से भर गया है जिनके होने से जीवन सबेर की चिड़ियों के कलरव जैसा लगता है!जो सब शरीक होने आये हैं दीक्षांत के उत्सव में।                  तस्वीर -BHUPRO(TWITTER) जी बीते तीन वसन्त बाद उत्सव हो रहा है इसलिए भी उत्साह तीगुना है।इस उत्सव व उत्साह में आत्मा जगजावे,नींद का क्या ? सबेर से ही जलसे की तैयारी आरम्भ है,कभी कंघी न मिलती ,कभी किसी को सीसा न मिलता व देर से जगने वालों की हड़बड़ी हमारा प्रेस किया हुआ कुर्ता चिमुड़ाया तो जान ही लूँगा!वाह -वाह कुर्ते से तस्वीर चकामाका न आएगी बल्कि ठण्ड के प्रसाधनों से रूखी त्वचा को स्नान कराने से आयेगी।बक्क बेवकूफ!तस्वीर तो ........मुस्कान से भी आ सकती है! मुस्कान तो आई कुर्ते को पहनने पर किसी के लाद पर चढ़ जाये, किसी के घुटनों से भी नीचे आ जाये!पर फ़र्क नहीं पड़ता शरीर पर उत्तरीय व साफा इस कमी को भर देता नौकरी का सूट भी शायद इतना न फबे जो अभी कुर्ता फब रहा है!       डीजे की गूं...

विदेशी शब्दों को अपनी भाषा में लपेट लेना

हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार है रितेश मिश्रा  अपने ट्विटर हैण्डल पर रोचक चीजें लिखते रहते है,वहीं से आज एक नया शब्द व उसकी  व्याख्या देखी।आप भी देखिये शब्दों का खेल किलांट ये शब्द ठेठ इलाहाबादी या अवधी के मुँह से सुन लेंगे आप.  अब ये शब्द आया कहाँ से ? आजकल तो शादी ब्याह में शहर -देहात, हर जगह DJ की धूम है लेकिन हमारे बचपन में किलांट बजाने वाले ही हुआ करते थे. लोग कहते थे की मोहम्मद निसार , युसूफ का लड़का, गजब किलांट बजाता है। इलाहाबादी बोलचाल में किलांट का अर्थ perfection हो गया । जैसे  " गजब किलांट गाड़ी चलाय रहा है बे "  असल में किलांट एक वाद्य है जिसका सही शब्द है clarinet जो फ्रेंच के शब्द clarinette से आया । जो बाद में शादी ब्याह में बजाने लगे  अपभ्रंश होते होते  ये "किलांट"  हो गया साभार-@riteshmishraht  

कुछ तस्वीरें कुछ यादें

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  यह जानते हुए भी।             दरख़्तों की छायाएं कि आगे बढना निरंतर कुछ खोते जाना और अकेले होते जाना है मैं यहाँ तक आ गया हूँ जहाँ दरख्तों की लंबी छायाएं मुझे घेरे हुए हैं......  अज्ञेय चूल्ह कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त-नागार्जुन                            सितम्बर में बलरामपुर में आई बाढ़  मैंने एक बार अनुपम मिश्र से पूछा था, "बाढ़ क्यों आती है?"  वे बोले: "पानी की अपनी स्मृति होती है. आप उसे उसकी जगह से हटायेंगे, वह लौट कर आ जाएगा."(आशुतोष भारद्वाज ट्विटर)