मार्केज़ के किस्से
कल कतर में होने वाले फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप पर ख़बर पढ़ी ,कैसे विश्वकप विवादों में घिरा है। हालाँकि फुटबॉल जगत के लिए एक दो साल में परिस्थितयां बदली है ,पिछले साल क्लब को लेकर ख़बर थी ।ख़ैर फीफा देखना अच्छा लगता है ,2010 से फीफा को लेकर दिलचस्पी जगी। उसी साल शकीरा का गीत वाका -वाका भी आया ,एक साथ दो काम हो गये पाश्चात्य संगीत से साहचर्य बढ़ा व फुटबॉल की तरफ रुझान। हालांकि फुटबॉल अभी ठहरा है ,शकीरा को अभी भी सुनता हूँ ।खासकर जब फीफा हो तो एकदफा जरूर।पर शकीरा के बारे में ज्यादा कुछ अता -पता नहीं था ,कोरोना के समय एक ब्लॉग (पढ़ते-पढ़ते) पर मार्केज़ का लेख पढ़ा ,इसे पढ़ने के बाद शकीरा पीछे तो न छूटी पर कुछ समय के लिए मार्केज़ से सध गया।शकीरा व फीफा से इतर मार्केज़ को पढ़ना शुरू किया।पिछले दिनों एक किताब पढ़ी जिसमें मार्केज़ के ढ़ेर सारे किस्से पता चले .....उसी किताब से कुछ किस्से..... साल था 2002 का,मार्केज़ ने गार्जियन के लिए लेख लिखा।लेख शकीरा पर था,लेख गार्जियन से निकलकर दुनिया के अखबारों में छप गया ,वो सबसे ज्यादा छपने...