महामना की जन्म जयंती
आलोचक कहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री 'नरेंद्र मोदी 'को अपने पुरखे प्रधानमंत्रियों में प्रथम प्रधानमंत्री 'नेहरू' से विशेष प्रेम है।इसलिए वह समय समय पर अपनी ओट छिपाने के लिए उनको आगे करते रहते है।पर बीते दिनों अटल स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स के विद्यार्थी रहे राजनाथ सिंह ने भी अपनी एक सभा में उनको स्मरण किया। राजनाथ सिंह जी ने गुजरात में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बाबरी के मुद्दे पर नेहरू जी सरकारी खजाने से पैसा खर्च करके बाबरी मस्जिद बनवाई जानी चाहिए। उसका भी विरोध यदि किसी ने किया था तो गुजराती मां की कोख से पैदा हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया था।जिसके बाद कांग्रेस ने इस पर कड़ी आपत्ति की थी।साथ ही साथ बहुत सारे पत्रों का हवाला भी दिया था।यही नहीं इसी के आस पास Nehru archive भी आम लोगों के लिए शुरू हो गया।यह सब चल ही रहा था तो मेरी भी दिलचस्पी नेहरू को लेकर नए सिरे से बढ़ी।दरअसल इन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही है तो लाइब्रेरी के बाहर खुली धूप में बैठना हो रहा है। वहां बैठे बैठे एक दिन यह सब सोच रहा था तो वहां लाइब्रेरी के सामने ही एक प्रशस्ति जैसा पत्थर है।जिस पर ॐ पंडित नेहरू के उद्धरण अंकित है।उस दिन उसे पुनः पढ़ा और सोचा कि नेहरू जी के जब उद्धरण यहां अंकित है तो विश्वविद्यालय में उनका आना जाना होता होगा।यहां एक कथा भी हर कोई सुनाता है कि एक बार नेहरू जी भारत कला भवन के उद्घाटन पर भाषण दे रहे थे।वह भाषण अंग्रेजी में दे रहे थे।इस पर जनता के बीच से वासुदेवशरण अग्रवाल ने उठकर खड़ा होकर कहा कि आप हिन्दी में बोलिए किसी को अंग्रेजी समझ नहीं आ रही है।तब प्रधानमंत्री को कोई इस तरह बोल सकता है।यही जानकर आश्चर्य होता है।इसलिए उस रोज nehru archive और internet archive पर नेहरू जी और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उनका आगमन , पत्राचार आदि पढ़ने की कोशिश की।और बहुत सारी जानकारियां मिली....आज महामना की जन्मतिथि है।उनसे भी नेहरू जी का राब्ता रहा है।
काशी विश्वनाथ कारीडोर से एक सड़क मैदागिन की तरफ निकल जाती है तो दूसरी काल भैरव के लिए।जब कालभैरव वाली सड़क पर आगे बढ़ते है तो दाहिनी तरफ एक पुरानी इमारत है।जिसे टाउन हॉल के नाम से जाना जाता है।एक जमाने में यह ऐतिहासिक इमारत रहीं है जिसमें भारत छोड़ों आन्दोलन की विद्रोह की तैयारी होती और नेताओं के भाषण।पर आज यहां एक हिस्से में पुलिस रहती है।दूसरे हिस्से में कुत्ते सोए रहते है। जब इस इमारत को देखने गया था,तब यही दृश्य था।इसी टाउन हॉल में पंडित नेहरू ने मालवीय जयंती पर साल 1949 में एक भाषण दिया था।जिसमें पंडित नेहरू ने कहा कि पंडित मालवीय भी हमेशा कर्मठता पर बल देते थे। उनके कर्म सबके सामने हैं। उनके द्वारा स्थापित हिंदू विश्वविद्यालय उनकी रचनात्मक प्रतिभा का एक अमिट प्रमाण है। हालांकि, भारत में सच्चे राष्ट्रवाद की नींव रखने में उन्होंने जो कुछ किया, उसका पूर्ण मूल्यांकन करना कठिन है। उन्होंने हमारे समक्ष महान आदर्श प्रस्तुत किए। उनका तेजस्वी चेहरा, वाणी और कर्म उनके गहन सांस्कृतिक परिवेश को दर्शाते थे। केवल उनकी प्रशंसा करने के बजाय हमें उनके जीवन से सीख लेकर कुछ हासिल करना चाहिए।
इसी के आगे बढ़ने पर कमोवेश इसी रंग की एक और इमारत है।जहां एक बोर्ड है जिस पर लिखा है मालवीय जी ने यहीं पर नागरी प्रचारिणी की स्थापना की थी।इसकी तस्दीक श्याम सुंदर दास अपनी आत्मकथा में भी करते है
जब डेपुटेशन भेजने की तैयारी हो रही थी तब उसमें सभा के भी एक प्रतिनिधि के सम्मिलित करने का निश्चय हुआ । सभा ने बाबू राधाकृष्णदास को अपना प्रतिनिधि चुना । पर पंडित मदन- मोहन मालवीय को यह स्वीकार न था । सभा के और मालवीय जी के विचार में बड़ा अंतर था। सभा यह चाहती थी कि जिसने काम किया है उसे ही सम्मान देना चाहिए, पर मालवीय जी के हृदय में दूसरे भाव थे । उनका डेपुटेशन राजाओं, रायबहादुरों और प्रसिद्ध रईसों का था । मालवीय जी के जीवन पर एक साधारण दृष्टि डालने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनके हृदय में राजाओं, रईसों आदि के लिये अधिक सम्मान का भाव रहा है । यही कारण है कि उन्हें हिंदू- विश्व - विद्यालय की स्थापना में इतनी सहायता मिली कि वे अपने स्वप्न को प्रत्यक्ष रूप दे सके ।
अस्तु, समस्या सामने उपस्थित थी, उसके हल करने का एक- मात्र उपाय यही था कि स्वयं मालवीय जी को सभा का प्रतिनिधि बनाया जाय । ऐसा ही किया गया और इसका परिणाम यह हुआ कि मालवीय जी ने नागरी प्रचार के लिये जो अथक परिश्रम और प्रशंसनीय उद्योग किया था उसका बहुत कुछ श्रेय काशी - नागरी- प्रचारिणी सभा को उनके प्रतिनिधित्व स्वीकार करने से प्राप्त हो गया।
लेकिन जहां तक राज महाराजाओं वाली बात है वो हमें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के मौके पर दिखता है।जिसके बारे में अशोक पांडेय ने अपनी पुस्तक उसने गांधी को क्यों मारा में रेखांकित किया है "1916 में बीएचयू का उद्घाटन था ।वायसराय सहित देश के अनेक राजाओं और प्रतिष्ठित जनों द्वारा उसका उद्घाटन होना तय हुआ तो गांधी को भी बुलावा आया।राजे-महाराजे सोने -चाँदी से सुशोभित शाही लिबासों में थे बाकी लोग सूटेड -बूटेड ।गांधी मामूली धोती-कुर्ते में।जब वह बोलने गए तो मंच की अध्यक्षता दरभंगा के महाराजा सर रामेश्वर सिंह कर रहे थे।गांधी जैसे अपनी बेचैनी के साथ आए थे ।उन्होंने कहा-
"महाराजा साहब ने कल भारत की गरीबी पर बात की ।अन्य वक्ताओं ने भी इस पर बहुत जोर दिया ।लेकिन इस विशाल पंडाल में जहाँ वायसराय द्वारा विश्वविद्यालय का
एक ऐसा प्रदर्शन जिसे देखकर पेरिस से आया जौहरी भी चमत्कृत रह जाएगा।मैं इन सजे -धजे कुलीन जनों से कहना चाहता हूँ :भारत की मुक्ति तब तक नहीं सम्भव है जब तक आप अपने इन गहनों से मुक्ति न पा लें और देशवासियों के लिए इसे एक ट्रस्ट में न दे दें ...जब भी मैं ब्रिटिश भारत या किसी रजवाड़े में किसी महल के निर्माण की ख़बर सुनता हूँ तो तुरन्त मुझे ईर्ष्या होती है और मैं कहता हूँ -ओह !यह वह धन है जो किसानों से आया है।"
इसके आगे भी गांधी का और बीएचयू का संबंध अंतर्विरोध का रहा है।यूं तो साल 1920 असहयोग आंदोलन की शुरुआत का वर्ष था।जिसमें गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम के अंतर्गत राष्ट्रीय स्कूल व कॉलेजों की स्थापना करनी थी।कई कॉलेज व स्कूल खुले भी ।जिसमें जामिया मिलिया,बिहार विद्यापीठ ,काशी विद्यापीठ
व गुजरात विद्यापीठ की स्थापना इसी समय हुई।इसके साथ ही इसमें शिक्षा का बहिष्कार की भी घोषणा थी।पर मालवीय जी इसके पक्ष में नहीं थे।उनका मानना था कि
पहले छात्रों को शिक्षा दिया जाए जिसके बाद वो अपने को देश के लिए समर्पित हो सकेंगे और असहयोग आंदोलन में
भाग ले सकेंगे।मालवीय जी की सोच थी कि बिना शिक्षा के छात्रों का जीवन बदल जायेगा और बिना शिक्षा के वो देश की सेवा के लिए कमतर साबित होंगे।उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि राष्ट्रीय आंदोलन में भाग ले रहे
बहुत से लोग जिसमें गांधी स्वयं है।ये सारे लोग ब्रिटिश शिक्षा के प्रोडक्ट थे।इसके आगे मालवीय जी का कहना था कि साल 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के बाद शिक्षा भारतीयों के हाथ में ही थी।90 % से ज्यादा भारतीय शिक्षक ब्रिटिश स्पोर्ट स्कूल में कार्यरत है और उन स्कूलों में भारतीय पैसा ही लगा है।इस फैसले के बारे में विचार रखते हुए मालवीय जी के बेटे पद्मकांत मालवीय का कहना था कि उनके पिता के जो भी निर्णय रहे हो,चाहे वो राजनीतिक ,सामाजिक ,निजी आदि आदि. पर इन सबसे परे वह महान ऋषि मनु की सलाह में विश्वास करते थे कि
अमृत को ग्रहण करना चाहिए भले ही वो विष से निकला हो।
मालवीय जी के इस फैसले पर गांधी जी ने प्रतिक्रिया भी दी।इसके लिए उन्होंने रामायण के राम और रावण के उद्धरण प्रयोग किये।जिसमें उन्होंने ब्रिटिश को रावण के रूप में रखा।साथ ही साथ उन्होंने मालवीय जी पर आरोप लगाया कि वह' satanic 'ब्रिटिश सरकार को समर्थन दे रहे है।आगे उन्होंने कहा कि
"वर्तमान में रामराज्य और रावण के बीच युद्ध चल रहा है। यह ईश्वर और शैतान के बीच की लड़ाई है, जो बुरे और अच्छे लोगों के बीच का संघर्ष है। मुझे लगता है कि यह सरकार 'शैतानी आत्मा' के वश में है। जब से मुझे सच्चाई का एहसास हुआ है, मैं इसी विचार को बढ़ावा दे रहा हूं पर अब मैं सच कहने के उठ खड़ा हूं। मेरा मानना है कि ब्रिटिश सरकार का स्वभाव राक्षस के जैसा है...
इसी कारण से मेरे और श्री शास्त्री व पंडित के बीच भिन्न विचार पैदा हुए। हालाँकि मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ और हमारी मित्रता मेरे लिए मूल्यवान है, फिर भी हमारी राय अलग है। उनका मानना है कि इस सरकार में कुछ अच्छा है, जबकि मेरा मानना है कि यह पूरी तरह से पाप पर आधारित है।"
इसके बाद साल 1920 में नवंबर के महीने में गांधी जी बीएचयू के कैंपस में आए।मालवीय जी ने उन्हें छात्रों को संबोधित करने के लिए बुलाया कि गांधी जी छात्रों को असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए मनाए।गांधी जी ने छात्रों से कहा कि मैं इसमें नहीं जाना चाहता कि यह
शैतान साम्राज्य क्यों है?लेकिन एक ऐसे साम्राज्य जिसने पंजाब में छह सात साल के बच्चों को गर्मी में चलाकर मार दिया उसका दोषी है,जिसने महिलाओं का अपमान किया है।लेकिन साम्राज्य की तरफ से आधिकारिक घोषणा हुई कि उसने सिर्फ साम्राज्य बचाने की कोशिश की है।मेरे विचार में ऐसे साम्राज्य के स्कूल में पढ़ना सबसे बड़ा अधर्म है।पंडित जी मेरे बड़े भाई की तरह है उनको यह धर्म के अनुरूप प्रतीत होता है।मेरे शास्त्रों ने मुझे ऐसा नहीं सिखाया है।मैं रावण गीता ,कुरान या बाइबल से कुछ नहीं सीख सकता।
गांधी जी के संबोधन के बाद महामना ने छात्रों को संबोधन करने के लिए खड़े हुए , उन्होंने असहयोग आंदोलन में क्या समस्या देखी है?उन्होंने छात्रों से कहा कि इस समस्या को ध्यान से विचार करे और स्वयं निर्णय ले की उन्हें असहयोग आंदोलन में भाग लेना है की नहीं।
इसके बाद लगभग 200 छात्रों में से सिर्फ चार ने असहयोग आंदोलन में भाग लेने का निश्चय किया।इसके साथ कुछ अध्यापकों ने भी असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए विश्वविद्यालय छोड़ दिया।इसमें सबसे बड़ा नाम jb कृपलानी का था।
असहयोग आंदोलन में शिक्षा के बहिष्कार से बीएचयू भले ही बच गया लेकिन सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बड़ी संख्या में छात्रों ने विश्वविद्यालय को छोड़ दिया।सरकार की तरफ से अनुदान भी कम हो गया था।बल्कि स्थिति ऐसी उत्पन्न हो गई थी कि विश्वविद्यालय ही बंद हो
जायेगा।इस समय महामना भी नैनी जेल में स्वयं बंद थे।
इसके बाद यहां के शिक्षकों व छात्रों ने एक संकल्प लिया
जिसकी रिपोर्ट इलाहबाद (प्रयागराज) से निकलने वाली पत्रिका 'भविष्य' में दर्ज है।जिसमें कर्मचारियों ने तय किया कि जब तक विश्वविद्यालय की आर्थिक समस्या पूर्ण रूप से सुधर नहीं जाती तब तक वो आधे वेतन पर काम करेंगे।
वहीं विद्यार्थियों ने राजपूताना हॉस्टल में विद्यार्थियों ने एक सभा कर घोषणा की है कि वो वर्तमान फीस 22 रूपये के मुकाबले जो सिर्फ 10 रूपये देते थे।अब अगले 10 महीने तक वो 25 रूपये फीस देंगे...
ऐसी महामना की महान संकल्पना थी।आज उनकी जन्मजयंती पर
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