कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली




बनारस में लल्लनटॉप अड्डा हो रहा था। लल्लनटॉप अड्डा के मंच पर पांच विद्वान मौजूद थे।उनमें प्रोफेसर अवधेश प्रधान व व्योमेश शुक्ल भी थे।अड्डा के आरंभ में ही सौरभ द्विवेदी ने प्रोफेसर अवधेश प्रधान से बनारस को लेकर प्रश्न किया कि बनारस को लेकर बहुत सारे मिथ ,बहुत सारा रोमैनटिसीजम चलता है।आप बनारस को किस दृष्टि से देखते है?एक वो दृष्टि है,जिस ढंग से पेश किया जा रहा है।पिछले पांच,दस ,पंद्रह ,बीस साल से, वो टूरिज्म वाला बनारस है।और एक बनारस  है,जो यहां के लोग जीते हैं,जो यहां की हवा की मलंगई के साथ घुला मिला है।
इसके उत्तर में प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने कहा कि बनारस का जो रोमांटिक चेहरा है,वो उसकी मस्ती का चेहरा है।और उसकी लोक संस्कृति का चेहरा है।लेकिन क्लासिक रूप से तो काशी यानि प्रकाश की नगरी है.............

इस प्रकाश की नगरी में दीपावली के बाद पुनः प्रकाश होने जा रहा है।अब बारी देव दीपावली की है।पौराणिक आख्यानों में इसकी क्या कहानी है ?और आज के समय  बनारस में देव दीपावली में कितना बदलाव आया है?आगे के लेख में इन्हीं पर चर्चा है..... 

हिन्दू धर्म में पूर्णिमा का अपना ही महत्त्व है।हर पूर्णिमा किसी न किसी पर्व या कथा से जुड़ी होती है।चैत्र पूर्णिमा में जहां हनुमान जयंती होती है।तो माघ पूर्णिमा में माघी स्नान का महात्म्य है।पर इन सब पूर्णिमाओं में कार्तिक पूर्णिमा श्रेष्ठ है।इस पूर्णिमा को ही बनारस में देव दीपावली मनाई जाती है।इस दिन ऐसी मान्यता है कि देवता आकाश से काशी की धरती पर आते है और दीपावली मनाते हैं।वहीं स्कंद पुराण के काशी खंड में राजा दिवोदस की कथा मिलती है।जो काशी के राजा थे।जिनके राज्य में देवताओं के आने पर रोक लगी थी।राजा दिवोदस सब कार्य स्वयं सम्पन्न करते थे।लेकिन भगवान शंकर इस नगर से दूर नहीं रहना चाहते थे।तो इस नगर में भगवान शंकर के आने से पहले दिवोदस के समक्ष कितने देवता आए और उनका दोष ढूंढते पर वो सफल नहीं रहे।बाद में  दिवोदस ने देवताओं को नगर में आने की अनुमति दे दी।इसके बाद जब देवता नगर में आए तो इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया।उसके बाद वो इसे उल्लास के साथ मनाने के लिए कार्तिक पूर्णिमा को काशी आने लगे।वहीं एक दूसरी कथा है कि जगत की रक्षा के लिए भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया था।इसके बाद तारकासुर के तीन पुत्रों ( कमलाक्ष, तारकाक्ष और विद्युन्माली ) ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान स्वरूप तीन नगरों को प्राप्त किया।जो सोने ,चांदी और लोहे से बने थे।जहां शस्त्र से भी  उनका कुछ नहीं हो सकता।इनके आतंक से जब देवता कांप उठे ।तब वो इनके संहार के लिए भगवान शंकर के पास पहुंचे।भगवान शंकर को सब देवताओं ने अपने विशेष अस्त्र अर्पित किए और भगवान शंकर के लिए एक रथ का निर्माण किया जिसके सारथी भगवान ब्रह्मा बने।जिसके बाद भगवान शंकर ने अपने विजय नामक धनुष से एक ही बाण का संधान कर त्रिपासुरों का संहार कर दिया।जिसके बाद देवताओं ने भगवान शंकर को त्रिपुरान्तक और त्रिपुरारि नामों से स्तुति की।

 कार्तिक पूर्णिमा सिर्फ हिन्दू धर्म में ही प्रकाश पर्व नहीं है बल्कि सिक्ख धर्म में इस दिन प्रकाश पर्व होता है।सिक्खों के पहले गुरु गुरुनानक देव (1469- 1539)का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। गुरुनानक बनारस के गुरुबाग गुरुद्वारे में ठहरे भी थे।कार्तिक पूर्णिमा को यहां से भव्य शोभा यात्रा निकलती है।

यही नहीं जैन धर्म में भी पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है।जैन धर्म का यह सबसे पवित्र दिन है।शत्रुंजय जैन धर्म का सबसे पवित्र तीर्थस्थल है,जो गुजरात के भावनगर जिले में पालीताणा के पास स्थित है।कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही यहां से शत्रुंजय गिरिराज की यात्रा आरंभ होती है।
चातुर्मास की समाप्ति के बाद इसी दिन जैन मुनि व आर्यिका विहार के लिए निकलते है।जैन ग्रंथों में मान्यता है कि द्रविड़ और वारिखिल्ला सहित करोड़ों मुनियों ने शत्रुंजयश पर्वत पर मोक्ष प्राप्त किया था।जैनों में यह  पूर्णिमा निर्वाण का दिन है।यहां जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर 
ऋषभदेव/आदिनाथ की आराधना होती है।

वहीं बंगाल के नदिया में ऐसी मान्यता है कि शारदीय दुर्गा पूजा या काली पूजा के बाद कार्तिक पूर्णिमा को शाक्त रास महोत्सव मनाया जाता है।इस दौरान काली,लक्ष्मी गंगा अन्य देवियों की प्रतिमा स्थापित कर पूजा होती है।इस पूजा के तार चैतन्य महाप्रभु के समय से जुड़ी है।जब 16 वीं सदी में चैतन्य महाप्रभु द्वारा वैष्णव (कृष्ण मार्गी)आंदोलन शुरू किया।उस समय वैष्णव व शाक्तों के बीच झड़प भी हुई।

इसी तरह उड़ीसा में बोइता वंदना कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।इसमें कलिंग वासी केले के पत्तों से छोटी छोटी नाव बनाते है और प्रतीकात्मक रूप से अपने पूर्वजों की उस यात्रा का स्मरण करते है जब वो इस कार्तिक पूर्णिमा को दक्षिण पूर्व  एशिया में व्यापार के लिए निकलते थे।

With special input Prakhar भैया.

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