शुभमन गिल

 साल 1990 का था पंजाब में के पी एस गिल एसपी हुआ करते थे।उनका स्लोगन था मारूंगा भी और रोने भी नहीं दूंगा।पंजाब तब उग्रवाद की जड़ में था।लेकिन यहां भी बात पंजाब से जुड़ी है, पाकिस्तान की सीमा से सटा एक जिला है फाजिल्का जिसमें एक गांव है जैमल वाला जहां अपने पिता के फॉर्म हाउस में एक लड़का दिन भर प्रैक्टिस करता।उसके दोस्त जब खेलते तो उनको डांट पड़ती पढ़ाई के लिए लेकिन उसके साथ ऐसा नहीं था।बचपन के ही साथी रहे मयंक मारकंडे के साथ फीफा गेम खेलता जो मन में आता वो खाता लेकिन जिम में सबसे पहले पहुंचता।कप्तान बनने की उसकी इच्छा नहीं थी ,अंडर 19 में कप्तानी कर सकता था लेकिन छोड़ दिया।उसने शॉर्ट आर्म जैब से अलग ही छाप छोड़ी ,लोग उसे प्रिंस कहते हैं, कमेंट्री करने वाले प्रिंस से किंग की ओर अग्रसर बताते हैं।पर शतक के बाद वो सात्विक मुस्कान साधे रहता है.... यह कहानी भारतीय टेस्ट के
युवा कप्तान शुभमन गिल की जिन्हें न सिर्फ कप्तानी से बल्कि बल्लेबाजी से भी एक बड़े वैक्यूम को भरना है जो एक ही समय में दो दिग्गज भारतीय बल्लेबाज रोहित शर्मा व विराट कोहली के टेस्ट से संन्यास लेने के बाद खाली हुआ है।आगे हम एक नज़र शुभमन के क्रिकेट जर्नी को देखेंगे.......
कप्तान शुभमन गिल




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