अहिल्याबाई होलकर

 बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद बाजीराव प्रथम गद्दी पर

बैठे व कृष्णा से अटक तक का नारा दिया था।इन्हीं के शासन में मराठों ने पुर्तगालियों से सालसेट व बसीन भी जीता।यही नहीं इनके शासन में मराठों की चार भावी पीढ़ियों का भी उदय हुआ जिसमें इंदौर के होल्कर,ग्वालियर के सिंधिया,बड़ौदा के गायकवाड़ व नागपुर के भोंसले थे।जिसमें इंदौर के होलकर रियासत की रानी ने अपने राज काज से न सिर्फ होलकर रियासत बल्कि भारत वर्ष को भी समृद्ध किया।रानी के बारे में कहा जाता है कि होलकर वंश के संस्थापक मल्हार राव होलकर एक रात चौदी राज्य में डेरा डाला था।वहीं उन्होंने मन्कोजी शिंदे की आठ वर्षीय बेटी को देखा,जिसकी निष्ठा व चरित्र से वो काफी प्रभावित हुए और अपन पुत्र खांडे राव के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा।उस बेटी का नाम था अहिल्या बाई।शादी के बाद भी अहिल्या बाईं को शिक्षा के साथ साथ सैन्य व राज प्रशासन की शिक्षा दी गई।1745 तक वह मालेराव व मुक्ता बाई की मां बन गई थी खांडेराव अपने पिता के साथ भरतपुर के अभियान में साथ थे,इसी अभियान में उनकी गोली लगने से मृत्यु हो गई।इसके बाद खंडेराव की पत्नियां सती होने को आगे बढ़ी उनमें अहिल्याबाई भी थी लेकिन मल्हराव ने उन्हें ऐसा करने से मना किया।मल्हार राव ने अपने लिखे पत्रों में उनको राज्य के नवीन सैन्य हालात व प्रशासनिक मामलों पर सलाह दिया करते थे।इसी के बाद उन्होंने तय किया कि उनका जीवन राज्य की सेवा में व्यतीत होगा।उसके एक दशक बाद ही मल्हाराव होलकर का भी निधन हो गया और राज्य की जिम्मेदारी पूरी तरह से अहिल्या बाई पर आ पड़ा।

साहस से जब किया संघर्ष का सामना


मल्हाराव के निधन के बाद अपने पुत्र मालेराव को उन्होंने 

उन्होंने गद्दी पर बैठाया।लेकिन मालेराव का आचरण दुष्टता से भरा था ,वह ब्राह्मणों को दिए जाने वाले भिक्षापात्र में

बिच्छू व सांप रख देता था और जब वो ब्राह्मणों को डस लेते

तो आनंद मनाता था।वहीं उसके इस कृत्य से अहिल्याबाई को घोर पीड़ा पहुंचती।चूंकि एक साल के बाद ही मालेराव 

का निधन हो गया और अहिल्या बाई के समक्ष उत्तराधिकार का प्रश्न उठ खड़ा हुआ।अहिल्याबाई ने राज्य की बागडोर खुद संभालने का साहस किया जबकि उनके दीवान की इच्छा थी कि वो किसी को गोद लेकर राज्य उसे सौंप दे।ऐसा न होने पर रघुनाथराव से राज्य के विलय लिए अनुरोध किया

और उसके बदले उपहारों की बात की। इस मौके का फायदा

उठाने के लिए वह अपनी सेना के साथ शिप्रा के तट पर डेरा डाला।इसके बाद रानी ने महिला टुकड़ी के साथ युद्ध करने की घोषणा कर दी।लेकिन अपने ही कुल की महिला पर हमला करने से उसका अपयश ही फैलेगा और महादजी शिंदे

भी इसके खिलाफ थे।राघोबा ने अपना फैसला बदला और रानी को चिट्ठी भेजवाई की वह उन पर हमला नहीं बल्कि उनके पुत्र के शोक में सम्मिलित होने आया था।इसके बाद एक सप्ताह इंदौर में उनका स्वागत हुआ और उसके बाद वह पूना लौट गए।वहीं रानी ने अपने फैसले से राज्य कौशल का परिचय भी दे दिया।



रानी का युग


इस संघर्ष के बाद इंदौर के स्वर्णिम दिनों का प्रारंभ होता है 

क्योंकि अहिल्या बाई स्वतंत्र होकर राज काज के फैसले कर रही थी जिसमें उनका सहयोग तुकोजी कर रहे थे जो सेना के प्रधान सेनापति भी थे।लेकिन राज्य हित व नागरिक हित

में अहिल्या बाई ही फैसला करती थी।यही नहीं न्याय के मामलों में वह स्वयं उपस्थित भी होती थी।वो अपने निर्णयों में भी उदार रहती थी,मृत्युदंड तो तमाम बातों के बाद ही दिए जाते। वहीं किसी दंपति के पुत्र न होने पर उसकी संपत्ति उसकी विधवा को सौंप देती जो उस समय के हिसाब से एक महत्त्वपूर्ण बदलाव था।इसके इतर इंदौर की कर प्रणाली दुरुस्त व व्यापारियों के लिए सुगम व्यस्था से इंदौर की आय में बढ़ोत्तरी भी हुई वहीं दूसरी तरफ तमाम रियासतें अपने युद्धों की वजह से आय के संकट से जूझ रही थी।लेकिन अहिल्या बाई के शासन में इंदौर के राजस्व में निरंतर वृद्धि हुई।


संस्कृति का पुनर्निर्माण 


अहिल्या बाई सिर्फ अपने न्याय व कर्त्तव्यपूर्ण फैसले के लिए ही नहीं बल्कि सभ्यता व संस्कृति के पुनर्निर्माण के भी उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है।इंदौर से 100किमी की दूरी पर सुरम्य नर्मदा के तट पर उन्होंने महेश्वर नाम से राजधानी बसाई।यहां कला व संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिलता है । जहां एक तरफ मराठी कवि मोरोपंत,शाहीर अनंतफंदी व संस्कृत के खुशाली राम उनके दरबार में थे।वहीं दूसरी तरफ शिल्पियों व स्थापत्यकारों की भी मौजूदगी थी जिसका ग्वाक्ष रजवाड़ा है।यही नहीं बुनकर समुदाय को वहां लाना और स्थानीय लोगों को उस कला से परिचित कराकर महेश्वर की आत्मनिर्भरता को भी बढ़वा दिया।उसी दूरदर्शिता का नतीजा आज भी है कि माहेश्वरी साड़ी की बाजार में मांग तेज है।इसके अलावा मुस्लिम आक्रमणों के समय तोड़े गए अनेक हिन्दू मंदिरों का पुनर्निर्माण भी करवाया। जिसमें सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक के मंदिर शामिल है।आज भी काशी विश्वनाथ मंदिर उस जगह खड़ा है तो इसमें अहिल्या बाई का अप्रतिम समर्पण है।जो तीन बार उजड़ा गया।जिसमें औरंजेब के समय 1669 का एक शासनादेश ही था हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का और काशी विश्वनाथ को उसमें ध्वस्त कर दिया गया ।यहां ज्ञानवापी नाम से मस्जिद बनाई गई।आज भी या 

काशी विश्वनाथ के कॉरिडोर के बनने के बाद भी जब नजदीक से मस्जिद को देखेंगे तो उसकी दीवारें मंदिर के दीवारें जैसी दिखाई देंगी।इस मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल1717 ई में अहिल्याबाई ने किया जिससे मंदिर खड़ा हो सका

और बाद में इस मंदिर के शिखरों को रंजीत सिंह ने सोने से

मंदित किया था।


जीवन के आखिरी चरण में


यूं तो अहिल्याबाई का जीवन तमाम उतार चढ़ावों से होकर गुजरा और वो हर संघर्ष को अपनी जिजीविषा से जीतती गई

जिसमें असमय पति का निधन हो या अपने ससुर मल्हारराव होलकर का निधन हो।लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में जब

अपनी पुत्री मुक्ताबाई के विवाह उपरांत कठिन परिस्थितियां

आई तब उनका साहस डगमगा गया।उनकी पुत्री जो अपने पुत्र को खो देने के बाद जब सती होने के लिए बलवती हो उठी और अहिल्याबाई के रोकने का विवरण मैल्कम कुछ यूं देते है 

"अपनी बेटी को उस घातक संकल्प से हटाने के लिए एक माता द्वारा कोई प्रयास किया जाना पुण्यात्मक अहिल्याबाई

द्वारा शेष नहीं रखा गया था।अपने ईश्वर की तरह ,उसके समक्ष धूल में बैठकर उन्हें पृथ्वी पर अकेला छोड़ न जाने का 

अनुरोध किया।"


इस घटना के बाद उनका जीवन बदल गया और समय के साथ उनका शरीर क्षीण होता गया और 1795 ई में उन्होंने जीवन की आखिरी सांस लिया।उनके बाद इंदौर की बागडोर तुकोजी ने संभाली।


एनी बेसेंट ने अहिल्याबाई होलकर को कुछ यूं याद किया है

इंदौर की इस महान शासक ने अपने अधीन सब को उनका सर्वश्रेष्ठ देने को प्रोत्साहित किया था,व्यापारियों ने सबसे अच्छे कपड़े बनाए ,व्यापार की तरक्की हुई,किसान शांत थे और दमन समाप्त था,क्योंकि रानी के सामने वाले हर मामले

पर सख़्त कार्रवाई होती थी


वहीं आज जब विऔपनिवेशिकरण की चर्चा जोरो पर हैं तो समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाले शासक व शासिकाओं को याद किया जाना जरूरी हो जाता है।इंडियन 

एक्सप्रेस में अदिति नारायणी पासवान ने अपने लिखे लेख

Celebrating Rani Ahilyabai Holkar gives us an opportunity to reclaim our history में लिखती है 

होलकर का जीवन व योगदान और दर्शन पर हमारे विद्वानों, कार्यकत्तार्ओं और आम जनता द्वारा अधिक गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। केवल अतीत का ज्ञान ही हमें वर्तमान को समझने और इतिहास को पुनः प्राप्त करने में सहायता कर सकता है।








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