मौनी अमावस्या ने ताजा कर दी, आजादी के बाद पहले महाकुंभ की स्मृति

कुबेरनाथ राय का एक निबंध है'स्नान एक सहस्त्रशीर्षा अनुभव'जिसमें वो लिखते है कि"स्नान तो प्रत्येक सभ्य जाति द्वारा महत्वपूर्ण कर्म है।"ऐसे में कुंभ लगा और 144 वर्षों बाद एक बड़ा संयोग बना तो कौन इस अमृत की डुबकी में स्नान करने से बचेगा?इसलिए त्रिवेणी के तट पर

आस्था का जन सैलाब उमड़ता है।हर कोई इस अमृत स्नान में डुबकी लगा कर अपने मैल को यहीं तिरोहित कर देना चाहता है।पर मौनी अमावस्या के दिन यहां इतनी भीड़ पहुंची की स्नान एक हादसे में बदल गया और तीस पुण्यात्माओं को

अपनी जान गंवानी पड़ी।


पर यह कोई पहला अवसर नहीं है जब महाकुंभ में ये हादसा हुआ है।साल 2013 के महाकुंभ की मेरी स्मृति खुद एक हादसे से जुड़ी है।हमारी बुआ उस कुंभ में गई थी और वहां पुल के टूटने से भगदड़ मची थी।जिसमें कई लोगों की जानें गई थी।बुआ सौभाग्यशाली रही कि उस हादसे में बच गई थी।उसके बाद वो इस हादसे का जिक्र करती तो रोंगटे खड़े हो जाते थे।साल 2025 के महाकुंभ में भी

मौनी अमावस्या के दिन भगदड़ हुई जिसने


साल 1954 का महाकुम्भ (Getty images)

साल 1954 के महाकुंभ की भगदड़ की स्मृति पुन: ताजा कर दी है।जो आजादी के बाद पहला महाकुंभ था।जिसमें एक हाथी की वजह से भगदड़ हुई और  सरकारी आंकड़ों के अनुसार 800 लोगों की जान चली गई।इस महाकुंभ के लिए जैसे अस्थाई जिला बनाया गया है वैसा उस महाकुंभ में

अस्थाई जिला बनाया गया था। 'इलाहाबाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट '(DM)।जिसमें 'जे एन उगरा 'कुंभ नगर के डीएम जबकि 'जे एन त्रिपाठी '(SSP) थे। जे एन त्रिपाठी ने पुलिस वालों के लिए एक बुकलेट जारी की थी जिसमें लिखा था

"स्वतंत्रता के अवसर पर, हमारे देश का प्रत्येक नागरिक पुलिस से अपने उचित व्यवहार की अपेक्षा करता है… हमारे पूछताछ कार्यालयों में तैनात कांस्टेबलों को उन व्यक्तियों के प्रति विनम्र व्यवहार करना चाहिए जो पूछताछ कार्यालयों में जानकारी प्राप्त करने के लिए आते हैं|"वहीं विश्वनाथ प्रसाद खरे जो महाकुंभ के भगदड़ के बाद इंक्वायरी कमेटी के सदस्य थे ,तीर्थयात्रियों से बातचीत के ब्यौरे देते हुए कहते है कि"मर जाएंगे तो तर जायेंगे।बच जायेंगे तो घर जाएंगे। हमारा तो दोनों में फायदा है ।ऐसा भाग्य कहां जो ऐसे पुण्य क्षेत्र में,ऐसी घड़ी में मरे।"दूसरी तरफ 'अमृत बाजार पत्रिका ' ने रिपोर्ट किया कि ये भगदड़ प्रशासनिक

विफलता को दर्शाती है और आगे यदि योजना असफल रहती है तो आगे भी दुर्घटना की सम्भावना है।


इस घटना के बाद लोकसभा में 22 फरवरी 1954 को इलाहाबाद(प्रयागराज) के सांसद पुरुषोत्तम दास टंडन व तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू आमने -सामने थे........






तस्वीर -x(Twitter)


पुरुषोत्तम दास टंडन ने कहा कि"

हमारी संस्कृति प्राचीन है,लेकिन बौद्धिक है।जिस तरह का हमारा यह मेला है,उस तरह के मेले मुसलमानों में भी चलते हैं।ठीक है,प्रबंध करना पड़ता है,लेकिन भीड़ आवे इसके लिए न्योता न दीजिए, निमंत्रण न दीजिए।भीड़ का आवाहन न कीजिए।भारतीय संस्कृति को बिना समझे-बूझे कीचड़ में मत घसीटिए।भारतीय संस्कृति मूढ़ग्रहों या'सुपरस्टीशंस' का बंडल नहीं है।जो लोग भारतीय संस्कृति को नहीं समझते हैं,वह समय पर उसकी बुराई कर देते हैं।युक्ति हीन विचारेतु,धर्म हानि:प्रजायते। जहां बुद्धि नहीं है,युक्ति नहीं है,उस विचार से धर्म की हानि होती है।"





 प्रधानमंत्री नेहरू


इसके उत्तर में प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि "

गंगा के नहाने का मेरे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता,

परन्तु जहां कहीं भी भारतीय लोग बहुत बड़ी

संख्या में इकट्ठे होते हैं,उनका मुझ पर बहुत अधिक

प्रभाव पड़ता है और मैं उनके जैसा बनना चाहता हूं

उन्हें समझना चाहता हूँ।इसी कारण जब मुझे अवसर मिलता है,तो मैं ऐसे स्थान पर जाने का प्रयत्न करता हूं।यदि लोग जाकर गंगा में डुबकी लगा लें,तो इससे मेरी कोई हानि नहीं होती और मुझे समझ नहीं आता कि मैं इस विषय में अपनी

शक्ति व्यर्थ नष्ट क्यों करूं ,जब मेरे दूर करने को और बहुत सी बुराइयां हैं।मैं सोचने लगता हूं कि लोग सैकड़ों वर्षों से ऐसा क्यों करते चले आ रहे हैं,

इसके पीछे ....कौन सी शक्ति है?इसके पीछे जरूर कोई और बात होगी और मैं तो अपने आपको उनके अनुकूल बनाना चाहता हूं क्योंकि मैं भी उनमें

से ही एक हूं और उन्हें समझना चाहता हूँ।"


इस समझ के लिए हमें अपनी सभ्यता के पुरातात्विक साक्ष्यों को भी देखना होगा।जिसे कुबेरनाथ राय ने अपने निबंध में इस प्रकार

रेखांकित किया है " उस अविकसित युग में भी स्नान की कला इस देश में कितनी उन्नत और कितनी लोकप्रिय थी,इसका अंदाजा हम मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के ईसा पूर्व दो सहस्त्र पुराने स्नानागारों को देखकर कर सकते हैं,जिनके जल-निकास की व्यवस्था देखकर आज के अभियंता या इंजीनियर भी मात खा जाते हैं।"वहीं इस तरह का दूसरा उद्धरण हमें हर्ष के शासन काल में आए चीनी यात्री

ह्वेनसांग(युवान चुवांग) के विवरण से प्राप्त होता है।हर्ष प्रत्येक पांचवें वर्ष प्रयाग में धर्म सम्मेलन करके दान करता था।


ऐसे में जब स्नान का महाकुम्भ ही हो और त्रिवेणी के संगम पर

तो कौन इस अमृत पान से चूक जाना चाहेगा?पर स्नान के साथ

सभ्य नागरिक बोध भी जरूरी है,क्योंकि पिछले साल हाथरस की 

भगदड़ में सैकड़ों जानें गई।फिर भी हम सचेत नहीं हुए तो हमारे लिए जीवन के सबक ही क्या हैं?क्योंकि कहा जाता है 

सर सलामत तो सल्तनत हजार ,इसलिए स्नान के साथ इसका भी

बोध हो ,तो ऐसे हादसे न होंगे।









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