किंग चार्ल्स तृतीय का राज्याभिषेक
धनखड़ जी ब्रिटेन गए है,वहाँ चार्ल्स को चड्ढा की तरह नहीं कहा"आपने पहले ही काफी स्पेस घेर रखा है..पर चार्ल्स के साथ तस्वीर लगाकर जरूर बताया की चार्ल्स की ताजपोशी में
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| ताजपोशी के बाद चार्ल्स तृतीय |
शरीक होने आये है।लेकिन ये कोई नई बात तो है नहीं पर इतिहास तो जरूर है क्योंकि भारत को आज़ाद हुए अभी दशक भी न बीता था कि 'नेहरू' एलिजाबेथ द्वितीय के ताजपोशी में शरीक हुए थे।फिर आलोचना का दौर चलना ही था...और ये कोई नई चीज़ थी नहीं।इससे पहले की ताजपोशी में तो कवियों ने वो कविता लिखी जिसे पढ़ने के बाद पता ही नहीं चलता कि ये वही भारतेन्दु है जो अंधेर नगरी लिख रहे थे?फिर भी भारतेन्दु युग के कवियों ने विक्टोरिया व राजकुमार के लिए क्या कविता लिखी बानगी देखिये"स्वागत स्वागत धन्य तुम भावी राजधिराज
भई सनाथा भूमि यह परसि चरन तुम आज।"आगे तो दिल्ली दरबार हुआ ही।जहाँ जनता अकाल से ग्रस्त थी वहाँ लिटन कैसर -ए-हिन्द की आमद में व्यस्त था।भारतेन्दु लिखते है"उसको शाहनशाही हर बार मुबारक होवे
कैसरे हिन्द का दरबार मुबारक होवे।"
ये कड़ी आज़ादी के बाद भी चली नेहरू को तो खुद लगता था कि वो भारत में शासन करने वाले अंतिम अंग्रेज है।बाकी रेगिनेल्ड कोपलैंड ने कहा ही है भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश राज का शिशु था।

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