दिल्ली में चाँद
दिन का ताप कम हो चला है,पर्दों से ढंकी खिड़कियां खोल दी गयी है।झुर -झुर हवा चलने से सूखे हुए जी में दम लौटता है।ऊपर आकाश में लाल व हरे रंग से टिम -टिम वायुयान गुज़र रहें है।सामने की बहुमंजिला मकां के ऊपर अप्रतिम सौंदर्य से भरा चाँद निकल आया है।फिर क्या जनकपुर का पुष्पवाटिका प्रसङ्ग याद आया राम वैदेही को देख रहें है "सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥"आगे आपको पता ही है प्रेम में खलल डालने वाले हर जगह होते हैं।उनके भी यहाँ थे जब निशा में पुनः चन्द्रमा को देखते है तब वैदेही का अप्रतिम सौंदर्य उन्हें याद आता है पर वैदेही के सामने चन्द्रमा का सौंदर्य फ़ीका है"प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥"पर जीवन प्रेम से तो आगे बढ़ेगा नहीं ऊपर से होली ,सब छोड़ छाड़ यहाँ परदेस में आदमी कमाने -खाने के बीच अपने प्यार जनों को स्मरण तो करता ही है बाकी तो राही ने लिखा ही है "हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद अपनी रातकी छत पर कितना, तन्हा होगा चांद

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