स्मृतियों की रूहानी डाकिन

 दिव्य हमारे मित्र है ,छक कर पठन-पाठन करते है।बीच-बीच में

कुछ लिखते भी रहते है। उन्हीं का लिखा हुआ लेख ....जो उन्होंने स्मृतियों पर रचा है।




सांझ का पीलापन धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है और सारा गांव जैसे एक भूरे धुंधलके के गोले में सिमटने लगा है। जब साथ के लगभग सारे लड़के अपने-अपने मोबाईल पर गेम्स खेल रहे हैं तब मैं सच पर खड़ा होकर न जाने क्या सोच रहा हूँ। खड़े-खड़े सोचते जब थक जाता हूँ तो बैठ के लिखने लगता हूँ। सोच भी जाने कैसी? कि अगर अभी बर्फ पड़ने लगे तो पड़ोस में मिट्टी के घर में रहने वाले लोग कहाँ जायेंगे?(यह सोचना निरर्थक है क्यूंकि हमारे यहाँ बर्फ तो पड़ने से रही।) सबसे बड़ी बात मै ये सब चीजें लिख क्यूं रहा हूँ? जाने कौन पढ़ेगा पता नहीं पर ऐसा लग रहा है कि कोई तो होगा जो बिल्कुल समान भावनाओं को महसूस करता होगा। पल भर में ये मन विश्वविद्यालय कैंपस में घूम रहा है अगले ही पल गांव में नये बने मकानों की उम्र जांचने लगता है। कुछ ही देर में मैं आस पास के लोकजीवन पर मुग्ध हुआ जा रहा हूँ, पर अगले ही पर यकायक किसी चीख से ध्यान भंग हो जाता है। चीख भी मेरी ही! जैसे मेरा ही कोई अंश यहां से सैकड़ों मील दूर छूट गया है। जिसे मैं चाह कर भी वापस नहीं पा सकता हूँ। जैसे ही मैं उससे पीछा छुड़ाता हूँ, वैसे ही मेरा अतीत मुझे यादों की खाईयों में धक्का दे देता है। वहाँ से निकलने में काफी मशक्क़त करनी पड़ती है। क्यूंकि उसके ओसारे में रूहानी डाकिन जो बैठी है। यह कोई व्यक्तिगत रूचियों के कोरे प्रदर्शन हेतु अकारण प्रयोग की गई फैंटेसी नहीं है। जीवनरंग का पौधा जब यादों के बागीचे में खिलता है तो सीधे-सपाट से चल रहे जीवन में अजीब सा अवसाद छा जाता है। यह अवसाद ही अतिरिक्त मशक्क़त करवाता है। एक प्रकार का स्वप्निल संसार हमारे जीवन के प्रति आदिम दृष्टिकोण से छिन्न भिन्न हो जाता है। वैसे सोचता तो मैं हमेशा हूँ, सुख-दुख के सामंजस्य की मनोरंजक लेकिन निर्रथक चर्चाएं भी करता हूँ। पर आज न जाने क्यूं मुझे जीवन की प्रत्येक धड़कन अराजकता के निर्मम साम्राज्य सी लग रही है। क्या यह सब बातें मेरी वैचारिक प्रवृत्तियों का बासीपन है या फिर मैं अपने होने की तमीज़ भूल चुका हूँ! क्या मेरी यह सोच क्लासिकीय गरिमा से परिपूर्ण विराटबोध है जो भविष्य के लिए उद्बोधन हो सकती है या फिर अतीत से मुक्ति की तलाश में अपने परिवेश के प्रति लगभग संज्ञाहीन और उदासीन से मेरे लिए अंतहीन लगने वाली यातनाओं की सरहद है? गर्दिश के दिनों के इसी वैचारिक घालमेल, अस्पष्ट सत्य और व्यक्तिवादी आचरण के कारण मुझमें आत्ममुग्धता आ गई थी।

हमारे साथ ये तब हुआ था जब हम अपने अवधूत होने के भ्रम में थे। जो प्रकृति के रागात्मक संस्पर्श और अबोध उत्तरों से हट गई है। आत्ममुग्धता का हटना काफी निराशाजनक होता है। जब भ्रम का धुंधलका छंटता है और यथार्थ साफ साफ दिखाई पड़ता है तो मन खिन्न सा हो जाता है।


दिव्य अवधूत 

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय



Comments

  1. स्मृतियों की रूहानी डाकिन ♥️♥️♥️

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  2. भ्रम का टूटना एक तरह से मरना ही होता है कभी कभी ।
    बाकी शीर्षक बहुत अच्छा है 👍

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