मुंडेश्वरी धाम :संस्मरण
कमरे का दरवाजा खोलते ही अंधकार बाहर हो जाता है ;सामने आकाश से तारे गायब हैं सिर्फ चाँद निस्तेज की अवस्था में लटका है ।सहसा मुझे लगता है सब चले गए होंगे ।
इस चाँद की तरह मैं भी निस्तेज हूँ जो न उठने के मोह में पड़ा हूँ ।आज विभाग की तरफ से शैक्षणिक भ्रमण यात्रा है .
मुंडेश्वरी देवी के धाम जाना है ,यहीं से बिहार दर्शन भी होगा।
| प्रारम्भ चित्र-सिमरन देवा |
चंदौली की सीमा को छोड़ते ही बिहार शुरू हो जाता है ।बीच में कर्मनाशा पड़ती है जिनके ऊपर मनहूसियत का अतिरिक्त बोझ है ,स्नान करने से सारे पुण्य धुल जाते हैं पर मुझे तो कर्मनाशा से 'कर्मनाशा की हार' याद आती है ।ख़ैर बिहार जो कभी भारत का सिरमौर्य रहा है ,जिसे आज गाली की शक्ल में भी प्रयोग कर लेते हैं ।उसी बिहार में प्रवेश करते चौराहों पर क्रांतिकारी वीरों की प्रतिमा दिखती है ।सुकालू लोहार ,बाबू कृष्ण सिंह व कामरेड बुटन मास्टर का झण्डा ,एकाद और दिखी पर पोस्टरों से ढँक गयी थी ।जैसे -जैसे बिहार में दाखिल होते गए है ,उसकी विविधता दिखती गयी ।
सड़कें एकाद जगह टूटी मिली पर उन पर काम चल रहा था,दूसरी तरफ नहर का काम चल रहा था ।बीच -बीच में कभी सड़क के पट्ट पर बिहार के बड़े नेताओं का शिलापट्ट दिख जाता ,मुझे एक जगह मीरा कुमार का शीला पट्ट दिखा । सड़कों के किनारे गेहूँ लहरा रहें है ,सरसों पक चुकी है ।दूर का पहाड़ मानो नजदीक आ रहा हो ,सर बता रहें है हमारी यात्रा 17 किलोमीटर दूर है ।पर बीच में हरसू बरम का किला पड़ता है जहाँ लोगों अपने भूतों से पीछा छुड़ाने आते है ।मेरी स्मृति हरसू बरम का नाम सुनकर चौंकती है क्योंकि यहाँ के पण्डित जी आकर मेरे यहाँ से खूब सिद्धा पिसान ले जाते है ..
सड़क पर बस भाग रही है ,होली का गीत चल रहा है।सड़क के बगल में नहर है ।उस ओर की पहाड़ी बिलकुल साफ़ दिखाई देने लगी है ,सर बता रहें जो ऊँची पहाड़ी दिख रही है वही 'मुंडेश्वरी देवी 'का मन्दिर है ।बस रुक जाती है ,पेट पूजन का यहाँ प्रबन्ध है ,लोग छक कर खा रहें है ।बाहर धूप जलनशील है ,हवा का थपेड़ा भी है ।पर महादेव के उद्घोष से पहाड़ की चढ़ाई शुरू होती है ...
सड़कों के किनारे से आवाजें बुलाती है ,रवुआ प्रसाद ले लेहि 70 रुपया में प्रसाद एकदम पूरा ।लडकें झिड़क जाते है प्रसाद गुरु जी लेंगे ।सामने अखिलेश का नारा लगा रहें है एक जन सरकार बनने पर प्रसाद चढ़ाने का वादा कर रहें है ।बिहार के लोग भी अखिलेश में दिलचस्पी ले रहें है । सीधी खड़ी चढ़ाई है कुछ ही सीढ़ियों के बाद दम फूलने लगता है ।कुछ लोग ऊपर भाग रहें है ,कुछ बैठकर आराम कर रहें है ।कुछ गुरूजी के साथ मन्दिर के जगह -जगह खण्डित मूर्तियों व ध्वन्साशेषों पर चर्चा करते हैं
सीढ़ी चढ़ने के क्रम में थोड़ी दूर से ही मन्दिर के अवशेष व शिलाखण्ड मिलने शुरू हो जाते है ।ऐसी ही एक गणेश की खण्डित मूर्ति दिखती है । ऊपर चढ़ने पर जगह -जगह बोर्ड है जिन पर काफी कुछ लिखा है ।जो मन्दिर की प्राचीनता और इसके महत्व को उद्धाटित करता है ।
| गणेश की प्रतिमा चित्र-आदित्य मणि |
मैम मन्दिर की प्राचीनता पर विस्तार के साथ बात करती है।मन्दिर 6-7वीं सदी का है ,हालांकि 16-17 वीं सदी में इसके बारे में पता चलता है ।जब डेनियल ब्रदर्स यहाँ आते है और मन्दिर का छायांकन करते है ।उसके बाद बुकानन और अन्य विद्वान यहाँ पहुंचते है ।मन्दिर प्रांगण से 1892 में एक शिलालेख मिला है व दूसरा टुकड़ा 1904 का है जब ब्लॉच के नेतृत्व में पुरातत्वविदों के द्वारा पुरावशेषो को हटाया गया ।18 पंक्ति के इस शिलालेख का सम्पादन राखालदास बनर्जी
ने किया है जो इपिग्राफिया इंडिका के भाग 9 में 1907ई. में प्रकाशित हुआ ।
| मुण्डेश्वरी मुख्य मन्दिर चित्र -आदित्य मणि |
मुंडेश्वरी मन्दिर उत्तर भारत के नागर शैली का मन्दिर है ।मन्दिर अष्टकोणीय है ,चारों दिशाओं में द्वार है व चार कोणों से बाहर ताखे बनें हैं जिनमें दिक्पालों की मूर्तियां रहीं होंगी। वर्तमान समय में पूर्वी द्वार को बन्द कर दिया गया है ।मन्दिर के गर्भगृह की संरचना ऐसी है की तांत्रिकों का प्रभाव इस पर दिखता है । वहीं धार्मिक मान्यता है कि चन्दा व मुंडा भाई थे ,जो महिषासुर के सामन्त थे और इस क्षेत्र के शासक ।महिषासुर ने देवी के साथ युद्ध किया था । मुंडा ने मुण्डेश्वरी जबकि उसके भाई चन्दा ने चन्देश्वरी मन्दिर बनवाया था।
दूसरी मान्यता महाभारत से जुड़ी है ,कौरवों व पांडवों को शिक्षा के समय गुरु द्रोणाचार्य को इस अहिक्षेत्र (सर्पों का क्षेत्र)शासक बनया गया था। नाग वंश के शासकों का इस क्षेत्र पर प्रभाव था जिसकी पुष्टि शिलालेख से भी होती है।
मन्दिर की प्राचीनता से इतर हमारे दो साथियों की दिलचस्पी यहाँ होने वाली बलि प्रथा में थी ।ऐसी मान्यता है कि बकरा यहाँ पुनर्जीवित हो जाता है ।हमारे साथी रंजीत का कहना है कि पण्डित जी के यहाँ बकरा लाया जाता है वो बकरे को ठोकते है ,बकरा अचेत हो जाता है।बीच में पूजा -पाठ चलता रहता है ,पण्डित जी पुनः अक्षत व फूल फेकेंते हैं ।बकरा पुनः खड़ा हो जाता है ।वहाँ के निवासियों ने भी इस बात को स्वीकार किया ।
चित्र-अभिषेक
"मुंडेश्वरी में चतुर्मुख शिवलिंग भी है ,वहाँ के पुजारी जी का कहना है कि इसका रंग हर घण्टे बदलता रहता है ।" वहीं इस प्रकार के शिवलिंग के सम्बन्ध में वासुदेव शरण अग्रवाल का मानना है की कुषाण काल में मथुरा शिल्प शैली में इस प्रकार के शिवलिंग उस परिस्थिति में बनाये गए जब पाशुपत आचार्यों ने 'पंचब्रह्म 'का सिद्धान्त विकास किया था ।
मन्दिर का शिखर ध्वस्त हो चुका है पर इसके ऊपर शिखर रहा होगा ऐसा अनुमान किया जाता है । वहीं मन्दिर के सामने दो स्तम्भ हैं जिन पर गणेश ,सूर्य व कार्तिकेय का अंकन है।
इसके इतर भी मन्दिर प्रांगण में ढ़ेर सारे ध्वंसाशेष प्रस्तर पड़े हैं ,पर मन्दिर की चोटी पर ही एक पहाड़ी पर अशोक के समय का शिलालेख है ,जहाँ पहुंचने के बाद
शिलालेख में कम स्थान की रमणीयता में ज्यादा मन लगता है ।झीनी- झीनी हवा उमस में शरीर को आह्लाद से भर देती है । कैमरे वाले बन्धु से गुहार होती है ,सिर्फ फ़ोटो व फोटो पर हमें वहाँ से चलना पड़ता है ।क्योंकि पहाड़ी पर स्थान कम व भीड़ ज्यादा है ।इस पूरे शैक्षिणक भ्रमण पर सबसे आनंद इस जगह ही आया जहाँ से लौटने का मन न हो ।
वीडियो -अभिषेक रंजन
इस पहाड़ी से सुदूर ऐसा स्थान है जहाँ से सिर्फ लौटने की इच्छा होती है ।सूरज की आंच ,सीढ़ी की चढ़ाई व फ़ोटो शूट से ऊर्जा का पारा नीचे आ गया है ।यहीं तो इस शैक्षणिक यात्रा का हासिल है ,हम 52 पेज के लिखे आर्टिकल से इसे समझने का प्रयास करते शायद समझ न आता और ढ़ेर सारी बातें इतिश्री हो जाती ।यहाँ एक साथ इतना कुछ है की क्या समझें क्या छोड़े ?इस मनोदशा में ही डूबते उतराते रहते हैं ।
फील्ड में इस मनोदशा से तो नहीं चल सकते न ।यहाँ सारी मनोदशा व सदिच्छा छोड़ आपको भ्रमण व भ्रमण करना है ।
तभी आपको वो हासिल होगा ,जो उस क्षेत्र की खोज में एक नया आयाम खोल दे ,एक नई दिशा मिल जाये ...
सचिन सर यहाँ 1998 में आये है ,खूब भ्रमण किया है ।लोकल लोगों के साथ एक पहाड़ी के नीचे पहुंचते हैं ,जहाँ एक खण्डित हाथी की मूर्ति है ।इस प्रतिमा का यहाँ क्या औचित्य है ,98 से लेकर 2022 में इस स्थान में कितना परिवर्तन आया है ।पहाड़ी के बगल सड़क बन गयी है जिससे कितना इस स्थान में परिवर्तन हुआ है ।हाथी पर किसी ने नाम लिख दिया है व उसका एक पाँव टूट गया है ।आप कैसे अपने दोस्त को खड़ा कर उसकी मदद से पूरा चित्र ले सकते हैं जिसे ह्यूमन स्कल्पचर भी कहा जाता है।
चित्र-आदित्य मणि
इन सबका डाक्यूमेंटेशन कैसे करना है ।ये सब सर बता रहें है ।अत्याआधुनिक जीपीएस से लेकर बारीक स्केल व प्रारम्भ कैसे करते है ।ये इस यात्रा का सबसे रोचक पहलू रहा की फील्ड में आपको किस तरह की तैयारी करनी होती है ,अकेले रहने पर क्या विकल्प होता है ।यदि बेसिक व चार्ट आपके पास है कैसे कम समय में ज्यादा से ज्यादा साइट का डाक्यूमेंटेशन कर सकते हैं।
हमारे साथी रंजन इस पूरी प्रक्रिया से इतना प्रभावित हुए कि
आज ही कई साइट का डाक्यूमेंटेशन कर देंगे ।हालाँकि उनका कहना जायज समय की कमी है ,अब लौटना होगा ।आते समय फिर वो एक रचनात्मक वीडियो का सृजन ही कर लेते है ।शायद अगली दफ़ा आये तो इस यात्रा का अनुभव व बदला समय उनके लिए एक नये डाक्यूमेंटेशन की ख़ोज हो । हर हर महादेव .....
मार्क ट्वेन भी कह गए है "यात्रा का सुख उसकी वापसी में ही है।" वापसी का एक रचनात्मक वीडियो बनाया है रंजन ने ।इसी के साथ सुखद यात्रा सम्पन्न हुई।
वीडियो - अभिषेक रंजन
विशेष साभार -अर्चना व अर्पिता मैम ,सचिन सर
नोट-सांस्कृतिक विरासत को लेकर हम उतने ही चिंतित हैं जितना एक छोटा बच्चा अपनी पैंट को लेकर ।
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ReplyDeleteपत्थरो में जान ऐसे ही पड़ता है
ReplyDeleteआरम्भ उत्कृष्ट है 👌💐
ReplyDeleteभाषाई अशुद्धियों पर ध्यान दीजिए राय साहब। आपका राय साहबत्व आपको जरा भी भाषाई त्रुटि करने से रोकता है। बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं।
ReplyDeleteआपके द्वारा यह पढ़ा गया ,इसके लिए साधुवाद आपको।बाकी जिन त्रुटियों की ओर आपने ध्यानकर्षण कराया,उनको दूर कर दिया गया है।
Deleteमहोदय बहुत भाषाई त्रुटि तो नहीं है एक दो स्थानों पर है जो टाइप की गलती हो सकती है।
Deleteवाह raisahab
ReplyDeleteउम्दा
मुझे तो वहा जाने का अभी तक भाग्य नही मिला है लेकिन आपके इस लेखनी से ऐसा लग रहा है की हम भी आपके साथ ही घूम रहे है ।