बिहार के बहार की पड़ताल है 'रुकतापुर'
1865 में भी एडिसन आरनल्ड ने लिखा था:रेलवे भारत के लिए वह कार्य कर देगी जो बड़े -बड़े वंशों ने पहले कभी नहीं किया-जो अकबर अपनी दयाशीलता अथवा टीपू अपनी उग्रता द्वारा नहीं कर सके,वे भारत को एक राष्ट्र नहीं बना सके ।
तकरीबन दौ साल बाद पत्रकार लेखक इसी जोड़ने वाली ट्रेन से बिहार यात्रा पर निकलते है ।रेलवे ने जोड़ा तो है एक जिला मुख्यालय को जिला मुख्यालय से न जोड़कर बड़े बड़े महानगरों को ।सीधी ट्रेन पटना के लिए नहीं है लेकिन दिल्ली ,बम्बई और कोलकाता के लिए अनेकों ट्रेन है । इसी ट्रेन पर सवार होकर जनता अपनी बेकारी ,निराशा और अँधेरे में भविष्य को रेल के धुएँ की तरह पीछे छोड़कर पलायन कर रही है जिसकी ताकीद ट्रेनों के नाम भी करते हैं।श्रमजीवी एक्प्रेस ,जनसेवा एक्सप्रेस ,जनसाधारण एक्सप्रेस।कहने वाले ये भी कह सकते है"लागल झुलनिया के धाक्का बलम कलकत्ता पहुंच गये...
लेकिन यहाँ ट्रेन मुक्तापुर में रुके चाहे न रुके रुकतापुर में जरूर रुक जाती है।बुलेट के जमाने में ट्रेन किसी भरपेट खाये हुए आदमी की तरह चलती है ।ट्रेन को जहाँ नहीं रुकना होता है वहाँ भी चैन पुलिंग कर रोक दिया जाता है और उनके स्टेशन को रुकतापुर नाम दे दिया जाता है ।बिहार प्रदेश में रेलवे का इतना बढ़िया हाल क्यों है ?जब ललित नारायण मिश्र से लेकर लालू यादव तक कुल चार लोग देश के रेलवे मंत्री रहें हैं ।
रेलवे के पुल से सोन ,गण्डक ,बागमती ,पुनपुन और कोसी का भव्य नजारा देख आप हर्षित हो सकते है किन्तु इन नदियों के किनारे बसे जिलें पूर्णिया ,कटिहार ,किशनगंज ,सहरसा ,सुपौल हर्षित है ?कोसी -सीमांचल का क्षेत्र हर साल अपनी एक गाथा कहता है । कभी रेणु ने अपने रिपोर्ताज 'डायन कोसी ' में भी इस क्षेत्र का करूँण क्रंदन किया था" न मालूम कोसी मैया कब अपने मायके पहुंचेगी। जब तक मायके नहीं पहुंचती, मैया का गुस्सा शांत नहीं होता। पूरब मुलुक बंगाल से अपने ससुराल से रूठ कर, झगड़ कर, मैया पश्चिम की ओर अपने मायके जा रही है।"
आज भी कमोवेश हाल वहीं है।हर साल बाढ़ आती है और इस क्षेत्र के भविष्य को अपने कटान में बहा ले जाती है ।बची रह जाती है
तो मुख्यमंत्री जी का हवाई सर्वेक्षण और राहत राशि का एलान ।उसमें भी लड़ाई है क्योंकि बड़े पेट के बाद ही छोटे पेट को मिलें शायद न भी मिलें ।जीवन फिर शुरू करने के लिए पलायन एक्प्रेस पर बैठकर
महानगरों में बेकारी शुरू की जाती है ।इस बात की ताकीद लेखक भी करते है भले ही लोग 'जा झाड़ के 'वाला गाना गाकर अपनी रफ्तार बढ़ाने की कोशिश करते हैं।दरअसल,बिहारियों के पाँव में चक्कर है।उन्हें अपने घर में टिकना नसीब नहीं है।पहले कलकत्ता ,मॉरिशस और फिजी जाते थे,फिर दिल्ली और पंजाब जाने लगे ।अब केरल से लेकर कश्मीर तक किसी भी जगह चले जाते हैं।"
जल कहीं तबाही की गाथा लिख रहा है कहीं लोग जल की तबाही लिख रहें हैं ।दरभंगा में ढ़ेर सारे तालाब होते थे एक जमाने में ।जिसके लिए उपमा दी जाती थी 'पग -पग पोखर।' किन्तु आज इन तालाबों का अतिक्रमण कर सपनों का घर बनाया जा रहा है ।जो उस बुनियाद पर खड़ा हो रहा है जहाँ शरीर तो है पर उसकी आत्मा को उन सपनों के लिए कुर्बान कर दिया गया हो । इस समस्या का स्याह पक्ष उजागर करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता नारायण जी चौधरी कहते हैं,"दरअसल दिक्कत यह है कि बिहार में सबको इस बात की गलतफहमी है कि यहाँ पानी का कोई संकट नहीं है।इतनी बाढ़ आती है, लोग पानी का क्या करेंगे ?यह गलतफहमी उन्हें तालाबों को भर देने के लिए प्रेरित करती है।"
इन सबका फल ये है की आज दरभंगा में जगह -२ वाटर टैंकर घूम रहें है।लेकिन हाल सिर्फ दरभंगा का हो ये भी नहीं ।मोतिहारी शहर की पहचान मोतीझील पर भी अतिक्रमण चल रहा है ।झील के बीचोबीच घर बन गए हैं और एक -तिहाई जमीन पर अतिक्रमण कर लिया गया है।
जिससे उसका क्षेत्रफल कम हो गया है।प्रशासन अपनी नींद में है ,सरकार अपनी नींद में ।जबकि देश में जल संकट और शुद्ध पेयजल के लिए 'जलशक्ति मंत्रालय 'बनाकर इसे दूर करने पर मन्थन हो रहा है । रहीम भी कह गए है "रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। "
बिहार में बहार है ?सड़कें तो खूब बनी है ।सुशासन बाबू ने सड़कों से 15 साल में जंगलराज खत्म कर दिया ? लेकिन इस हाइवे की दुनिया में पटना किसी भी जिले से आने में जहाँ पांच घण्टे लगने चाहिए वहाँ 8 घण्टे 9 घण्टे लगते है ।एक दूसरा रूप भी है ।कुछ जगहों पर आज भी सड़कें धूल धूसरित ही है ।एक कथानक तो ये है कि एक क्षेत्र में सड़कें बिलकुल धूल धूसरित है किंतु एक गाँव जिसका नाम है 'शहरबन्नी 'वहाँ कंकरीट की सड़क है ।इसी गाँव के रहने वाले थे 'चिराग के पापा (स्व.रामविलास पासवान )हाँ ये अलग बात है की ,गाँव वो बहुत ही आते थे ।इसलिए एक गेस्ट हाउस बना दिया गया है ।जहाँ मकड़ियों ने अपना गेस्ट हाउस बना लिया है ।लेकिन सड़क की हकीकत क्या है इसे यूँ समझिये
"अब पहुंची हो,
सड़क तुम गांव....?
जब पूरा गांव,
शहर जा चुका ……..
सुशील कुमार मोदी का मानना है कि 'चाँद पर भी नौकरी निकल जाए तो बिहारी वहाँ भी पहुँच जाएँगे।'फिलहाल तो बिहार एक रुकतापुर स्टेशन है ,जहाँ प्रवासी मजदूर सिर्फ पर्व-त्योहार ,शादी -ब्याह और कोरोना जैसी आपदाओं के वक़्त ही लौटकर आते हैं ,फिर वापस लौट जाने के लिए।
लेकिन क्या ये हकीक़त सिर्फ बिहार की है उसके बगल सटे यूपी या दूसरे राज्य इन्हीं नक़्शे कदम पर नहीं चल रहें हैं ।सब के यहाँ यही समस्या है मेरे यहाँ तो लोगों ने गढ़ही ही भर दिया और जल निकासी सड़क पर हो रही है ।जल संरक्षण व् पर्यावरण कभी नेता के फ़ाइल में कभी प्रधान के फ़ाइल में दम तोड़ देता है।इसको पढ़ते हुए हर बार हताशा होगी पर आशा भी नज़र आयेगी ।लेखक की ख़बर का भी असर हुआ है ।आखिर में यही है थोड़ा सा भी हम अगर खुद चेत जाएंगे तो दूसरा कल जरूर चेत जाएगा और एक बेहतर भविष्य की तरफ बढ़ा जा सकेगा ।नहीं तो जुमला बाजी चलती रहेगी और ग्रेटा थरनाबेर्ग रोल मॉडल बनेगी जबकि तुलसी गौड़ा को गूगल सर्च कर जानना होगा।
अच्छा लिख रहे हो अविनाश 👌
ReplyDeleteशुरुआत तो सबसे सुन्दर है और बाकी बातें भी प्रभावी इसे एक विस्तृत समीक्षा कह सकते हैं