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जय छठी मैया

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  हे पीताम्बरधारी ! सादर प्रणाम । पीताम्बर देखने से ऐसे भी आह्लाद प्रकट होता है क्योंकि कालयवन की कथा याद आ जाती है और उसका काल कलवित हो जाना किन्तु यहाँ सन्ताप ,पीड़ा को काल कलवित करने के लिए सहचर का आगमन है ,छठ मैया मनोरथपूर्ण करें ....बाकी कुबेरनाथ राय रस आखेटक में लिखते है " कहते हैं कि किसी-२ चेहरे को देख कर दृष्टिस्नान का सुख मिलता है, दृष्टि दर्पण-सी निर्मम हो उठती है, शरीर के भीतर तीन दर्पण है:मुखदर्पण ,दृष्टिदर्पण और मनदर्पण।" फिलहाल ऐसा ही लग रहा है।             छठ घाट जाता व्रती                    

बरक्षा में

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 दुआर बुहार दिया गया है,सामने जगजगाती हुई नई कुर्सियां रखी हैं उनके नये होने का संकेत उन पर अभी चिपका हुआ स्टीकर है जिन्हें छोटे बच्चे बैठने के बाद खुर्च रहें हैं। उनके बैठने का प्रयोजन भी है , आस- पास चाशनी में लिपटी हुई बूंदी और रस में उतराये हुए गुलाबजामुन की गमक उनके मन को रमा रही है पर बूढ़े भी कम न ठण्ड की सिहरन की आहट और धूप का स्वाद सेंकने के प्रारम्भ में पेट को दिव्य व्यंजन और आहार इस हेमन्त में मिले तो कोई भी सुखदायी होगा।मौक़ा है बियाह का  दूसरी भाषा में ब्रह्मचर्य से गृहस्थ का ।                   चौका पे बैठे भावी वर  आखिर में विनोद कुमार शुक्ल (नौकर की कमीज़)में भी लिखते है"शादी के लिए जवानी उम्र से नहीं, नौकरी से मिलती है।"  बाकी गाली तो गायी ही जा रही है" बबुआ हमार पढ़ें अंग्रेजी तिलक काहे थोर जी ।"

मार्केज़ के किस्से

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 कल कतर में होने वाले फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप पर ख़बर पढ़ी ,कैसे विश्वकप विवादों में घिरा है।  हालाँकि फुटबॉल जगत के लिए एक दो साल में परिस्थितयां बदली है ,पिछले साल क्लब को लेकर ख़बर थी ।ख़ैर फीफा देखना अच्छा लगता है ,2010 से फीफा को लेकर दिलचस्पी जगी। उसी साल शकीरा का गीत वाका -वाका भी आया ,एक साथ दो काम हो गये पाश्चात्य संगीत से साहचर्य बढ़ा व फुटबॉल की तरफ रुझान।      हालांकि फुटबॉल अभी ठहरा है ,शकीरा को अभी भी सुनता हूँ ।खासकर जब फीफा हो तो एकदफा जरूर।पर शकीरा के बारे में ज्यादा कुछ अता -पता नहीं था ,कोरोना के समय एक ब्लॉग (पढ़ते-पढ़ते) पर मार्केज़ का लेख पढ़ा ,इसे पढ़ने के बाद शकीरा पीछे तो न छूटी पर कुछ समय के लिए मार्केज़ से सध गया।शकीरा व फीफा से इतर मार्केज़ को पढ़ना शुरू किया।पिछले दिनों एक किताब पढ़ी जिसमें मार्केज़ के ढ़ेर सारे किस्से पता चले .....उसी किताब से कुछ किस्से.....                साल था 2002 का,मार्केज़ ने गार्जियन के लिए लेख लिखा।लेख शकीरा पर था,लेख गार्जियन से निकलकर दुनिया के अखबारों में छप गया ,वो सबसे ज्यादा छपने...

नज़्ज़ारा दरम्याँ है

कुर्रतुल ऐन हैदर क्या अद्भुत लिखती है, उन्हीं की लिखी एक कहानी ...... ताराबाई की आँखें तारों की ऐसी रौशन हैं और वह चारों तरफ़ की हर चीज़ को हैरत से तकती हैं।दरअस्ल ताराबाई के चेहरे पर आँखें हैं।वह क़हत (अकाल) की सूखी मारी लड़की है जिसे बेगम अल्मास ख़ुर्शीद आलम के हाँ काम करते सिर्फ़ चंद माह हुए हैं, और वह अपनी मालकिन के शानदार फ़्लैट के साजो -समान को आँखें फाड़ -फाड़ देखती रहती है कि ऐसा ऐशोइशरत उसे पहले कभी ख़्वाब में भी नज़र न आया था ।वह गोरखपुर के एक गाँव की बाल -विधवा है, जिसके ससुर और माँ-बाप के मरने के बाद उसके मामा ने ,जो बंबई में दूधवाला भय्या है, उसे यहाँ बुला भेजा था।  अल्मास बेगम ब्याह को अभी तीन- चार महीने ही गुज़रे हैं।उनकी मंग्लूरियन आया जो उनके साथ मैके से आई थी'मुल्क'चली गई तो उनकी बेहद मुन्तजीम(प्रबंधक)ख़ाला बेगम उस्मानी ने,जो एक नामवर सोशल वर्कर हैं, एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज फ़ोन किया और ताराबाई पटबीजने (जुगनू) की तरह आँखें झपकाती कम्बाला हिल के 'स्काइस्क्रैपर'गल नसत्र की दसवीं मंजिल पर आन पहुँची।अल्मास बेगम ने उनको हर तरह क़ाबिले -इतमीना पाया ,मगर जब दूसरे मुलाजिमों ने...

स्मृतियों की रूहानी डाकिन

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 दिव्य हमारे मित्र है ,छक कर पठन-पाठन करते है।बीच-बीच में कुछ लिखते भी रहते है। उन्हीं का लिखा हुआ लेख ....जो उन्होंने स्मृतियों पर रचा है। सांझ का पीलापन धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है और सारा गांव जैसे एक भूरे धुंधलके के गोले में सिमटने लगा है। जब साथ के लगभग सारे लड़के अपने-अपने मोबाईल पर गेम्स खेल रहे हैं तब मैं सच पर खड़ा होकर न जाने क्या सोच रहा हूँ। खड़े-खड़े सोचते जब थक जाता हूँ तो बैठ के लिखने लगता हूँ। सोच भी जाने कैसी? कि अगर अभी बर्फ पड़ने लगे तो पड़ोस में मिट्टी के घर में रहने वाले लोग कहाँ जायेंगे?(यह सोचना निरर्थक है क्यूंकि हमारे यहाँ बर्फ तो पड़ने से रही।) सबसे बड़ी बात मै ये सब चीजें लिख क्यूं रहा हूँ? जाने कौन पढ़ेगा पता नहीं पर ऐसा लग रहा है कि कोई तो होगा जो बिल्कुल समान भावनाओं को महसूस करता होगा। पल भर में ये मन विश्वविद्यालय कैंपस में घूम रहा है अगले ही पल गांव में नये बने मकानों की उम्र जांचने लगता है। कुछ ही देर में मैं आस पास के लोकजीवन पर मुग्ध हुआ जा रहा हूँ, पर अगले ही पर यकायक किसी चीख से ध्यान भंग हो जाता है। चीख भी मेरी ही! जैसे मेरा ही कोई अंश यहां से सै...

मुंडेश्वरी धाम :संस्मरण

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 कमरे का दरवाजा खोलते ही अंधकार बाहर हो जाता है ;सामने आकाश से तारे गायब हैं सिर्फ चाँद निस्तेज की अवस्था में लटका है ।सहसा मुझे लगता है सब चले गए होंगे । इस चाँद की तरह मैं भी निस्तेज हूँ जो न उठने के मोह में पड़ा हूँ ।आज विभाग की तरफ से शैक्षणिक भ्रमण यात्रा है . मुंडेश्वरी देवी के धाम जाना है ,यहीं से बिहार दर्शन भी होगा। प्रारम्भ  चित्र-सिमरन देवा       चंदौली की सीमा को छोड़ते ही बिहार शुरू हो जाता है ।बीच में कर्मनाशा पड़ती है जिनके ऊपर मनहूसियत का अतिरिक्त बोझ है ,स्नान करने से सारे पुण्य धुल जाते हैं पर मुझे तो कर्मनाशा से 'कर्मनाशा की हार' याद आती है ।ख़ैर बिहार जो कभी भारत का सिरमौर्य रहा है ,जिसे आज गाली की शक्ल में भी प्रयोग कर लेते हैं ।उसी बिहार में प्रवेश करते चौराहों पर क्रांतिकारी वीरों  की प्रतिमा दिखती है ।सुकालू लोहार ,बाबू कृष्ण सिंह व कामरेड बुटन मास्टर का झण्डा ,एकाद और दिखी पर पोस्टरों से ढँक गयी थी ।जैसे -जैसे बिहार में दाखिल होते गए है ,उसकी विविधता दिखती गयी ।        सड़कें एकाद जगह टूटी मिली पर उन पर काम चल रह...

अँधेरे को मिटाने वाली है 'चाँदपुर की चन्दा'

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एक ब्लॉग पढ़ा था' पियवा से पहिले हमार रहलु (सन्दर्भ सहित व्याख्या)' अतुल राय ।पढ़ने के अगले चार रोज़ सिर्फ हंसता रहा और आज भी हंसने -हंसाने का जिक्र हो तो उसी को पढ़ता हूँ ।ब्लॉग वहीं है पर अतुल जी स्क्रीन राइटर हो गए है, इसी क्रम में एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है 'चाँदपुर की चन्दा' जिसे हमने पढ़ा और ये पोस्ट उसी का सार है ।अद्भुत किस्म का लेखन ;गाँव -मथार का जीवन्त प्रतीक है ।जितनी देर आप पढ़ेंगे लगेगा की गाँव जो आपका छूट चुका ,वहाँ फिर से पहुंचकर इस जीवन का आनंद लिया जाये । अपने भीतर के  मन्टू को उन्हीं गलियों में टटोल जाये ,तो पहली दफ़ा में इसको पढ़ जाइए ……. चाँदपुर की चन्दा-अतुल राय फाल्गुन चढ़ रहा है ,हवा सुरसुरा के बह रही है जो शीतल कम जलनशील ज्यादा लग रही है ।ये समय और हवा ही ऐसी नहीं है ;इसी के बीच बोर्ड की परीक्षा होती है ।परीक्षा से घबराहट तो जायज़ पर बोर्ड से तो न जाने क्या -क्या बड़ जाये ?हालांकि गाज़ीपुर व बलिया में कम धुक -धुकी होती है यहाँ यन्त्र का मायाजाल है जो सबकी पीड़ाओं को मुक्त कर देता है। दूर दराज के लोग यहाँ आते है पीड़ा से मुक्त होने के लिए ।इस साल भी आये है ,बं...