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गाज़ीपुर के राजकुमार!

  एक सड़क हादसे में पिता की देह नहीं रही।घर पर परवाह के लिए रूपये तक नहीं है।भला हो तेजू भइया का जिन्होंने इस कठिन समय में परिवार का ख्याल रखा।उस बात को झुठलाया कि बनला क सब बिगड़ला क केहू नाही।बहरहाल ये वही तेजू भइया जिनका एक स्टेडियम है जिसका नाम मेघबरन सिंह स्टेडियम करमपुर है।यहीं पर दो भाई राजू व जोखन खेला करते थे,उनका तीसरा भाई राज उनका खेल देखता था।उसके पास हॉकी स्टिक नहीं थी।बांस के स्टिक से खेला करता था।पर आज  उनके हाथ में एक कांसा है और पूरा गाजीपुर उसे छू लेना चाहता है ,मेडल कैसा होता है?पर राजकुमार का सफर इतना आसान नहीं था।उनको भी लोग कहते थे , ई कुछों ना करीहन , ई छोड़ के पढ़ाई लिखाई कर।अब तनी हमारे लईका के हॉकी सिखा द।