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दरख़्तों का बुढ़ापा

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 ताड़ीघाट की ट्रेन में हूँ।आमने -सामने की सीट पर दो लड़के  पब्जी खेल रहें हैं।मेरे बगल में बैठा लड़का रिल्स देख रहा है बाकी दो -चार बुजुर्ग होते लोग अपने यहाँ के विकास कार्यों की बातें कर रहें हैं।यहाँ जी चाहता है की खिड़की के यहाँ बैठा जाये और सरसों गेहूँ की रेल -ठेल देखी जाए पर ये हिंसात्मक खेल का शोर उन सारे रसों को नीरस कर रहा है।अगले स्टेशन पर ट्रेन का डिब्बा खाली व अकेली खिड़की सीट तबीयत हरी हो गयी। बूढ़ा दरख़्त खिड़की से दरख़्त की धूप-छाँव व बुजुर्ग थोड़ा जुड़ाने के बाद चल पड़ा।फिर दुष्यंत याद आते है "यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।"पर दरख़्त वो भी बूढ़ा दरख़्त अलग ही कहानी बयां करते है।सुशोभित ने लिखा है कि बूढ़े दरख़्तों के अंदर बेशकीमती जेनेटिक सूचनाएं है वे आस पास के इकोलॉजिकल सिस्टम को सपोर्ट करते है।वे आपस में गुफ़्तगू करते हैं आदि।बाकी डालमिया चौराहे पर कभी तड़के इस तरह की चीजों को महसूस कर सकते है।