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Showing posts from April, 2022

मार्केज़ के किस्से

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 कल कतर में होने वाले फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप पर ख़बर पढ़ी ,कैसे विश्वकप विवादों में घिरा है।  हालाँकि फुटबॉल जगत के लिए एक दो साल में परिस्थितयां बदली है ,पिछले साल क्लब को लेकर ख़बर थी ।ख़ैर फीफा देखना अच्छा लगता है ,2010 से फीफा को लेकर दिलचस्पी जगी। उसी साल शकीरा का गीत वाका -वाका भी आया ,एक साथ दो काम हो गये पाश्चात्य संगीत से साहचर्य बढ़ा व फुटबॉल की तरफ रुझान।      हालांकि फुटबॉल अभी ठहरा है ,शकीरा को अभी भी सुनता हूँ ।खासकर जब फीफा हो तो एकदफा जरूर।पर शकीरा के बारे में ज्यादा कुछ अता -पता नहीं था ,कोरोना के समय एक ब्लॉग (पढ़ते-पढ़ते) पर मार्केज़ का लेख पढ़ा ,इसे पढ़ने के बाद शकीरा पीछे तो न छूटी पर कुछ समय के लिए मार्केज़ से सध गया।शकीरा व फीफा से इतर मार्केज़ को पढ़ना शुरू किया।पिछले दिनों एक किताब पढ़ी जिसमें मार्केज़ के ढ़ेर सारे किस्से पता चले .....उसी किताब से कुछ किस्से.....                साल था 2002 का,मार्केज़ ने गार्जियन के लिए लेख लिखा।लेख शकीरा पर था,लेख गार्जियन से निकलकर दुनिया के अखबारों में छप गया ,वो सबसे ज्यादा छपने...

नज़्ज़ारा दरम्याँ है

कुर्रतुल ऐन हैदर क्या अद्भुत लिखती है, उन्हीं की लिखी एक कहानी ...... ताराबाई की आँखें तारों की ऐसी रौशन हैं और वह चारों तरफ़ की हर चीज़ को हैरत से तकती हैं।दरअस्ल ताराबाई के चेहरे पर आँखें हैं।वह क़हत (अकाल) की सूखी मारी लड़की है जिसे बेगम अल्मास ख़ुर्शीद आलम के हाँ काम करते सिर्फ़ चंद माह हुए हैं, और वह अपनी मालकिन के शानदार फ़्लैट के साजो -समान को आँखें फाड़ -फाड़ देखती रहती है कि ऐसा ऐशोइशरत उसे पहले कभी ख़्वाब में भी नज़र न आया था ।वह गोरखपुर के एक गाँव की बाल -विधवा है, जिसके ससुर और माँ-बाप के मरने के बाद उसके मामा ने ,जो बंबई में दूधवाला भय्या है, उसे यहाँ बुला भेजा था।  अल्मास बेगम ब्याह को अभी तीन- चार महीने ही गुज़रे हैं।उनकी मंग्लूरियन आया जो उनके साथ मैके से आई थी'मुल्क'चली गई तो उनकी बेहद मुन्तजीम(प्रबंधक)ख़ाला बेगम उस्मानी ने,जो एक नामवर सोशल वर्कर हैं, एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज फ़ोन किया और ताराबाई पटबीजने (जुगनू) की तरह आँखें झपकाती कम्बाला हिल के 'स्काइस्क्रैपर'गल नसत्र की दसवीं मंजिल पर आन पहुँची।अल्मास बेगम ने उनको हर तरह क़ाबिले -इतमीना पाया ,मगर जब दूसरे मुलाजिमों ने...

स्मृतियों की रूहानी डाकिन

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 दिव्य हमारे मित्र है ,छक कर पठन-पाठन करते है।बीच-बीच में कुछ लिखते भी रहते है। उन्हीं का लिखा हुआ लेख ....जो उन्होंने स्मृतियों पर रचा है। सांझ का पीलापन धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है और सारा गांव जैसे एक भूरे धुंधलके के गोले में सिमटने लगा है। जब साथ के लगभग सारे लड़के अपने-अपने मोबाईल पर गेम्स खेल रहे हैं तब मैं सच पर खड़ा होकर न जाने क्या सोच रहा हूँ। खड़े-खड़े सोचते जब थक जाता हूँ तो बैठ के लिखने लगता हूँ। सोच भी जाने कैसी? कि अगर अभी बर्फ पड़ने लगे तो पड़ोस में मिट्टी के घर में रहने वाले लोग कहाँ जायेंगे?(यह सोचना निरर्थक है क्यूंकि हमारे यहाँ बर्फ तो पड़ने से रही।) सबसे बड़ी बात मै ये सब चीजें लिख क्यूं रहा हूँ? जाने कौन पढ़ेगा पता नहीं पर ऐसा लग रहा है कि कोई तो होगा जो बिल्कुल समान भावनाओं को महसूस करता होगा। पल भर में ये मन विश्वविद्यालय कैंपस में घूम रहा है अगले ही पल गांव में नये बने मकानों की उम्र जांचने लगता है। कुछ ही देर में मैं आस पास के लोकजीवन पर मुग्ध हुआ जा रहा हूँ, पर अगले ही पर यकायक किसी चीख से ध्यान भंग हो जाता है। चीख भी मेरी ही! जैसे मेरा ही कोई अंश यहां से सै...